परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
यह होमकुण्ड और स्थण्डिल दोनों स्थानों पर किया जा सकता है। कुण्ड
में होम करना हो, तो उसमें या स्थण्डिल (वेदी) पर करना हो तो उस पर
ही प्रवेश क्रम के अनुसार अष्टकोण, षट्कोण या त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का
निर्माण करना चाहिये। प्रचलन त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का ही है। यह आचार्य
पर निर्भर करता है कि, होम के अनुसार अग्निचक्रों का निर्माण करे। कुण्ड
और स्थण्डिल के आकार-प्रकार पर भी यह निर्भर करता है।
त्रिकोण के मध्य में अग्नि देवता की नौ पीठशक्तियों की स्थापना और
पूजा करनी चाहिये। उनके नाम क्रमशः हैं—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा,
धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा और ज्वालिनी। तत्पश्चात् उसी त्रिकोण में
तमस्, रजस्, सत्त्व, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की इनके
आदि अक्षरों का बिन्दुयुक्त बीज बनाकर इनके चतुर्थ्यन्त रूप के साथ मन्त्रात्मक
उच्चारण कर पूजा करनी चाहिये। जैसे—
१. तं तमसे नमः अभ्यर्चयामि तर्पयामि नमः।
२. रं रजसे नमः, ३. सं सत्त्वाय नमः, ४. आम् आत्मने नमः, ५. अं
अन्तरात्मने नमः, ६. पं परमात्मने नमः। ७. ज्ञानात्मा के पहले ह्रीं बीजमन्त्र
लगाते हैं। जैसे—ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इन सरल मन्त्रों से ही इन पीठशक्तियों
की पूजा सम्पन्न होती है॥७॥
एवं पीठशक्तिपूजामुक्त्वा ततोऽग्निप्रतिष्ठामुपदिशति
ततो जनयिष्यमाणवह्नेः पितरौ वागीश्वरीवागीश्वरौ पीठेऽभ्यर्च्य
तयोर्मिथुनीभावं भावयित्वा ‘ह्रीं वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः’ इति
ध्यात्वा॥८॥
पीठे त्रिकोणात्मके अभ्यर्चितदेवताविशिष्टे तयोर्वागीश्वरीवागीश्वरयो-
र्मिथुनीभावं मैथुनकर्म मनसा भावयित्वा। ध्यात्वेति ध्यानं कामेश्वरीकामेश्वरवत्
तदभिन्नत्वात्॥८॥
इसी त्रिकोणात्मक पीठ में, जिसमें पहले अग्नि-शक्तियों और शक्तिमन्तों
की पूजा की जा चुकी है, उसी में अग्नि की प्रतिष्ठा करनी होती है। अग्नि