परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘सौः चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशितहस्तां प्रसन्नां सुधादेवीं पूजयामि नमः
स्वाहा।’ उसी अमृत-कलश पवित्र जल का भावन करते हुए पूजाद्रव्य का
प्रोक्षण करना चाहिये।।१६।।
तत्त्वकदम्बस्य हृत्पद्मानयनम्
पूर्वं नाभौ सम्मुद्रितं चिदग्निविलीनं तप्तायोद्रववत् षट्त्रिंश-
तत्त्वकदम्बकं हृत्सरोजे समानीय।।१७।।
पूर्वं पात्रासादनात्पूर्वमित्यर्थः। तप्तायोद्रववत् तप्तसुवर्णद्रववत्। वेदे
निघण्टौ सुवर्णपर्याये अयःपदसत्त्वात् प्रकृतायःपदमपि सुवर्णवाचकम्। इत्थं च
पूर्वं नाभौ षट्त्रिंशत्तत्त्वानि एकीकृत्य चिदग्निना द्रवीभावः सम्पादितोऽस्ति।
ताननूद्य हृदये तद्रसस्य समानयनं विधीयते।।१७।।
पात्रासादन के पहले नाभि में सम्मुद्रित अर्थात् एकीकृत रूप से चिदग्नि
में विलीन ३६ तत्त्वों का समूह जो चैतन्य के चमत्कार से इस रूप में परिणत
हो गया है। उसको हृदयकमल में मयूराण्डरस के समान मकरन्दरस की तरह ध्यान
करना चाहिये। इस प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये, चित् रूप प्रकाश में
३६ तत्त्वों को सोने के पिघले द्रव की तरह रस रूप में परिणत करने का प्रकल्पन,
एक विशेष प्रक्रिया है। फिर उसे हृदय में लाना और उसका अनुभव करना एक
अलग स्थिति है। इस स्थिति में उपासक परा पूजा के योग्य होता है।।१७।।
अथ पराचक्रं वक्तुं प्रक्रमते
मूलजप्तैः कुसुमक्षेपैर्वक्ष्यमाणैश्च मन्त्रैरासनक्लृप्तिं कुर्यात्।
मूलादियोगपीठाय नम इत्यन्तानि तानि च पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाश-
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दोपस्थपायुपादपाणिवाग्घ्राणजिह्वाचक्षुस्त्वक्श्रोत्रा-
हङ्कारबुद्धिमनःप्रकृतिपुरुषनियतिकालरागकलाविद्यामायाशुद्धविद्येश्वर-
सदाशिवशक्तिशिवाः। एवं पराचक्रं कृत्वा।।१८।।
प्रथमं केवलमूलेनैकवारं कुसुमक्षेपः। ततो वक्ष्यमाणैरेकतत्त्वमन्त्रेण,
मूलादिना योगपीठाय नम इत्यन्तेनैकवारं कुसुमाक्षतक्षेपो वक्ष्यमाणैर्मन्त्रैः।
यथा तत्र तत्त्वमन्त्रस्वरूपम्—पृथिवियोगपीठाय नम इति। एवं शिवान्तेषु