परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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विशेषार्घ्यद्रव्य से होता है। इसे अपने हृदय में ही सम्पन्न करना चाहिये।
तदनन्तर समस्त मन्त्र का उच्चारण कर ‘महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिका
श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र से देवी के मूल हृदय और मुख में दश बार
पूजन करना चाहिये। अवमर्शन का अर्थ पूजन ही होता है। ऐसी पूजित
वात्सल्यमयी करोड़ों कालानल की दीप्ति के समान अनन्त दीप्तिमन्त माँ का
ध्यान करना चाहिये।।२१।।
ततः कृत्यशेषमुपदिशति
तस्यां क्रियासमभिव्याहारेण वेद्यमखिलं हुत्वा ।।२२।।
तस्यां दीप्तौ हुत्वा हुतं भावयित्वा।।२२।।
कालाग्निकोटिदीप्तिरूप चिदग्नि में क्रियासमभिव्याहार क्रम से प्रत्येक वेद्य
का हवन करना चाहिये। प्रथम मन्त्र जैसे—‘सौः पृथिवीं जुहोमि स्वाहा’’ की
तरह सभी वेद्योँ का हवन करना चाहिये।।२२।।
मुखे अर्घ्यनिवेदनम्
मूलमुच्चार्य सामान्यपादुकया स्वमस्तकस्थाय गुरवे अर्घ्यं
निवेद्य ।।२३।।
सामान्यपादुकया दीक्षाप्रकरणे पठितगुरुपादुकामन्त्रेण।।२३।।
गुरुपादुका मन्त्र प्रथम खण्ड के सूत्र ४१ में दिया गया है। खण्ड दश
के सूत्र ३२ में भी श्रीपादुका के विषय में चर्चा है। इन सन्दर्भों के अर्थ को
ध्यान में रखते हुए गुरुदेव के दीक्षा नाम के पहले मूल अर्थात् पराबीज का
उच्चारण करते हुए ‘सौः स्वमस्तकस्थामुकानन्दनाथश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र
बोलकर गुरुदेव को अर्घ्य देना चाहिये।।२३।।
चिदग्नेरुद्दीपनम्
पुनश्चिदग्निमुद्दीप्तं विभाव्य ।।२४।।
गुरुदेव के अर्घ्य निवेदन के पश्चात् चिदग्नि के उद्दीप्त होने का विभावन
करना आवश्यक माना जाता है।।२४।।