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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 320 में से

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पृष्ठ 250

२०८ परशुरामकल्पसूत्रम्
अकलङ्कः कलङ्कशून्यो यः शशाङ्कश्चन्द्रस्तत्तुल्याभा। मुद्रा चिन्मुद्रा,
पुस्तं पुस्तकम्। एतेन द्विबाहुत्वं स्पष्टम्। अत्र पुस्तकं वामहस्ते, गणपति-
प्रकरणलिखितयामलवचनात् परिशेषान्मुद्रा दक्षे।।२०।।
'निष्कलङ्क चन्द्रमा के समान सौन्दर्यसुधासामरस्यमयी त्रिनेत्रा चन्द्र-
कलाकलिता मुद्रापुस्तकधारिणी द्विबाहुसुशोभिता परमा कला मेरी रक्षा करे।' इस
विमृष्टि के स्तर पर माँ सदाशिवरूप चन्द्रकलाकलिता परमाम्बा का ध्यान करना
चाहिये।।२०।।
अथ पूजामाह
मूलादिमुच्चार्य प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका, मूलमध्यमुच्चार्य
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका मूलान्तमुच्चार्य प्रकाशविमर्शरूपिणी
पराभट्टारिकेति त्रिभिः देव्या मूलहृन्मुखेष्वभ्यर्च्य समस्तमुच्चार्य,
महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिकेति, दशवारमवमृश्य तामेव
देवीं कालाग्निकोटिदीप्तां ध्यात्वा।।२१।।
मूलादिं सकारम्। तत्र बिन्दुयोगोऽपि। एवं मूलद्वितीयम् औं। तृतीयं
विसर्गः। मन्त्रस्वरूपं तु—'सं प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि
नमः'। एवमन्यत्। देव्या मूलं मूलाधारम्। इदं पूजनं विशेषार्घ्यद्रव्येण
आवरणदेवतावत् स्वहृदये ज्ञेयम्। समस्तं सम्पूर्णं मूलमित्यर्थः।
श्रीपादुकेत्यादियोजनम् अत्रापि अवमृश्य पूजयित्वा।।२१।।
मूल अर्थात् पराबीज को उच्चरित कर उसका आदि अक्षर बिन्दुयुक्त
बोलकर और इसके बाद प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका प्रयोग कर 'श्रीपादुकां
पूजयामि नमः' लगाना चाहिये। इस तरह प्रथम मन्त्र स्वरूप—'सौः सं प्रकाश-
रूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है।
इसी तरह मूल के साथ मूलमध्य 'औ' को लगाकर विमर्शरूपिणी
पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः, मन्त्र बनता है। इसी क्रम में मूलान्त्य
अर्थात् विसर्ग (अः) को मूल के बाद बोलकर तीसरा मन्त्र 'सौः अः प्रकाश-
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है, इन तीनों से
क्रमशः मूलाधार, हृदय और मुख में पूजन करना चाहिये। यह पूजन