परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोमविधिः २१९
भूमौ मृण्मयपात्रे पूर्वम्, आग्नेयान्यतमदिक्षु स्थापिताग्नेः कुण्डे
प्रक्षेपार्थम् उत्थापने मन्त्रमाह—
'उत्तिष्ठ हरितपिङ्गल लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय मे देहि
दापय स्वाहा' इति वह्निमुत्थाप्य ।।१२।।
एतेन ॐ वैश्वानरेति, बहिर्निर्गमय्य कुण्डे प्रक्षेपात् प्राग् अर्थक्रमेण
पाठक्रमं बाधित्वा प्रयोगानुष्ठानकाले पाठः, उत्थापनस्य प्रक्षेपपूर्व-
कालिकत्वात्।।१२।।
यह मन्त्र अग्नि के उत्थापन का है। उत्थापन वह क्रिया है, जो प्रक्षेप
के पहले सम्पन्न होती है। शास्त्र में एक नीति ऐसे अवसरों पर अपनायी जाती
है। वह है—'पाठक्रमेण अर्थक्रमो बलीयान्'। इसलिये इस मन्त्र से अग्नि को
उठाकर ॐ वैश्वानर (सूत्र-९) इस मन्त्र से प्रक्षेप करना उचित है। मन्त्र का
अर्थ स्पष्ट है।।१२।।
प्रज्वालनमन्त्रमाह
चित्पिङ्गल हन हन दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा इति
प्रज्वाल्य ।।१३।।
प्रज्वालनं वेणुधमन्या 'मुखेनाग्निं नोपधमेत्' इति श्रुतेः।।१३।।
बाँस की धमनी (फोंफी) अर्थात् पतले बाँस की एक पर्वमयी या गाँठों
के भीतर छेद कर २-३ पर्वमयी भी बनायी जाती है। उसी से आग को प्रज्वलित
किया जाता है। श्रुति कहती है कि, अग्नि को मुह से नहीं फूँकना चाहिये।
इसी परम्परा के अनुसार आग को धमनी से प्रज्वलित करना उचित है। मन्त्रार्थ
स्पष्ट है।।१२।।
उत्पन्नाग्नेः संस्कारानाह
षट्तारवाचो नमोमन्त्रेण पुंसवनसीमन्तजातकर्मनामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनगोदानविवाहकर्माण्यमुकाग्नेरमुककर्म कल्पयामि
नम इति विधाय ।।१४।।