परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपराक्रमः २०१
आसन के लिये सुकुमार ऊनी वस्त्र उचित होता है। 'सौः' वर्ण के साथ
सूर्य अर्थात् विसर्ग लगाकर पराबीज रूप मूलमन्त्र बनता है। इसी बीज से
अभिमन्त्रित जल से आसन को प्रोक्षित कर लेना चाहिये। ऐसे आसन पर बैठने
से उपासक की वैद्युतिक शक्ति उपासक में ही अधिष्ठित रहती है।।६।।
दैशिकयजनम्
उदग्वदनो मौनी भूषितविग्रहो मूलपूर्वेण दैशिकमनुना मस्तके
दैशिकमिष्ट्वा ।।७।।
उदग्वदन इति पराप्रकरणविधिः। भूषितविग्रहो वस्त्रभूषणादिभिः। मूलं
पूर्वं यस्य ईदृशेन दैशिकमनुना ।।७।।
परा प्रकरण के उपासन क्रम में उत्तर मुख बैठने का विधान है। माँ
राजराजेश्वरी के समक्ष उसका उपासक सामान्य परिधान में कैसे उपस्थित हो
सकता है। अपने को पूरी तरह यथाशक्ति सजाकर ही आसन पर बैठना उचित
है। प्रकरण में दैशिक सम्बद्ध गुरुपादुका १ मन्त्र का वर्णन है। उस मन्त्र में मूल
मन्त्र पहले लगाकर शिर के अग्रभाग में दैशिक की पूजा करनी चाहिये। पूरा
मन्त्र इस 'सौः ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं ग्लौं हस्रैं हसक्षमलवरयूँ सहक्षमलवरयीं
हसौः सहौः अमुकानन्दनाथश्रीगुरुपादुकां पूजयामि' इस मन्त्र से शिर पर
अंजलिबद्ध भाव से गुरुदेव का स्मरण करना चाहिये।।७।।
विघ्नोत्सारणम्
वामपाष्णिघातैः छोटिकात्रयेण पातालादिगतान् भेदावभा-
सिनः विघ्नानुत्सार्य ।।८।।
वामपाष्णिघातैर्वामपादपृष्ठभागघातैः (बहुवचनेन त्रित्वमेव) छोटिका-
त्रयेण। पातालादिपदेन अन्तरिक्षस्य दिशः परिग्रहः। पातालादित्रये अभिघात-
छोटिकयोः प्रत्येकमन्वयः। उत्सार्य दूरीकृत्य ।।८।।
१. सर्वसाधारणक्रम-सू. ३२।