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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

२०२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्त्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।।
इस मन्त्र को पढ़ते हुए बाँयीं एड़ी से भूमि में तीन आघात करना चाहिये।
इसी तरह तीन बार चुटकी बजाकर तीनों लोकों में अवस्थित विघ्नों का उत्सारण
करना चाहिये।।८।।
अङ्गन्यासः
शिरोमुखहृन्मूलसर्वाङ्गेषु मूलं विन्यस्य ।।९।।
अत्र शिरोमुखादिषु प्रत्यवयवं मूलावृत्तिः। सर्वाङ्गे सकृत्। मूले
मूलाधारे। पराप्रकरणे एतावानेव न्यासः। अधिकानुक्तेः ।।९।।
न्यासविधि में सूत्र के सामान्य निर्देश का विशेष अर्थ परम्परा में गृहीत
है। पहले 'सौः नमः' कहकर शिर, मुख, हृदय, मूल और सर्वाङ्ग का स्पर्श
पुनः सौःस् हृदयाय नमः, सौः औ शिरसे स्वाहा, सौः शिखायै वषट्, सौः स्
कवचाय हुम्, सौः औ नेत्रत्रयाय वौषट्, सौः१ अस्त्राय फट्।
विसर्गन्यास में स्वर नहीं लगाना चाहिये। इसमें न्यास की आवृत्ति हो
जाती है।।९।।
चिदग्नौ सर्वतत्त्वविलापनम्
काकचञ्चुपुटाकृतिना मुखेन सञ्चोष्यानिलं सप्तविंशतिशो मूलं
जप्त्वा वेद्यं नाभौ सम्मुद्र्य पुनः सप्तविंशतिशो जप्त्वा अङ्गुष्ठेन
शिखां बध्वा पुनरनिलमापूर्य तेन मूले चिदग्निमुत्थाप्य तत्र वेद्यस्य
विलयं विभाव्य ।।१०।।
काकचञ्चुपुटं काकमुखाग्रं तत्समाकृतिना स्वमुखेन सञ्चोष्यानिलं सम्यग्
बाह्यवायुमन्तर्नीत्वा वेद्यं षट्त्रिंशत्तत्त्वानि२ सम्मुद्र्य एकीकृत्य। अङ्गुष्ठेन
तन्मन्त्रेण नमः इत्यनेनेत्यर्थः। विलयं घनघृतम् अग्निसंयोगेन द्रवीभूतम्।
यद्यपि लयशब्दो नाशः, तथापि 'वि' उपसर्गेण द्रवत्वमर्थः। आज्यं विलाप्य
इति प्रयोगात्।।१०।।
१. अस्त्राय फट्। २. पराक्रम-सूत्र १८।