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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 320 में से

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पृष्ठ 245

पराक्रमः २०३
काकचञ्चुपुट के समान मुख और जिह्वाग्र गोलक से बाहरी वायु का
आन्तर आकर्षण हठयोग की प्राणायाम विधि के अन्तर्गत आने वाली क्रिया है।
उस वायु-समाकर्षण के बीच में ही २७ बार मूल-मन्त्र का जप आवश्यक है।
इसके बाद समस्त वेद्य को अर्थात् ३४ तत्त्वों को नाभि में एकत्र मापन
करना चाहिये।
तत्पश्चात् पुनः परामन्त्र का २७ बार जप करना चाहिये। शिखा बँधी
रहनी चाहिये। बँधी न हो, तो बाँधकर पुनः 'पूरक' करके चिदग्नि का उत्थापन
करना चाहिये। इस चिदग्नि में सारे वेद्य ३६ तत्त्वों का विलय कर देना चाहिये।
यहाँ वेद्य के विलय का सन्दर्भ विचारणीय है। वृत्तिकार विलय का अर्थ
पिघलाना कर रहे हैं। यह मेरी दृष्टि से उचित नहीं। यह एक प्रकार का
चिदग्निसात्करण व्यापार है। इस सम्बन्ध में एक श्लोक मैं लिख रहा हूँ। इस
पर विचार उचित है।
अन्तर्निरन्तरनिरिन्धनमेधमाने
कस्याञ्चिदद्भुतमरीचिविकासवेद्याम्।
मायान्धकारपरिपन्थिनि संविदग्नौ
विश्वं जुहोमि वसुधादिशिवावसानम्॥
इस श्लोक में भी संविदग्नि में विश्व अर्थात् वेद्य का चिदग्निसात्करण
है, पर मात्र ३४ वेद्यतत्त्वों का, शिवशक्ति का नहीं। अतः इस सूत्र के अनुसार
भी ३४ वेद्योँ का ही विलापन उद्देश्य है।।१०।।
अथार्घ्यसादनम्
गोमयेनोपलिप्तचतुरस्रभूतले प्रवहत्पार्श्वकरकृतया मत्स्यमुद्रया
दिव्यगन्धाम्बुयुतया भूव्योमवायुवह्निमण्डलानि कृत्वा।।१९१।।
प्रवहत्पार्श्वेति, येन नासापुटेन वायुर्वहति, तत्पार्श्वकरमधः कृत्वा,
रचितमत्स्यमुद्रया दिव्यः श्रेष्ठः। भूमण्डलं चतुरस्रं श्रीयन्त्रलेखने चतुरस्रे
भूबिम्बं क्षोणीपुरमिति भूरिप्रयोगात्। व्योममण्डलं वृत्तं, शून्यात्मकवृत्ते ज्योतिः-