परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
शास्त्रादौ संख्यासङ्केते आकाशशब्दस्य भूरिप्रयोगात् शून्यस्य वृत्तरूपत्वात्।
वायुमण्डलं षट्कोणं, वह्निमण्डलं त्रिकोणम्। इत्थं च चतुरस्र-वृत्तषट्कोण-
त्रिकोणानि इत्यर्थः।।९१।।
पूजा में साँस लेते समय यह ध्यान दीजिये कि, वह किस पुट में बह
रही है। मत्स्य मुद्रा में वही हाथ नीचे रखकर मत्स्यमुद्राबन्ध साधन करना उचित
है। गोबर से लिपे-पुते चतुर्भुज भूतल पर भूमण्डल, व्योममण्डल, वायुमण्डल,
वह्निमण्डल, इस तरह १. भूमण्डल चौकोर, २. व्योममण्डल वृत्ताकार,
३. वायुमण्डल षट्कोण और ४. वह्निमण्डल त्रिकोण बनाना चाहिये। इतनी
प्रक्रिया इस सूत्र के अनुसार पूरी कर लेनी चाहिये। यह क्रिया आवश्यक
होती है।।९१।।
शेषमर्घ्यमानमतिदिशति
श्यामावत् सामान्यविशेषार्घ्ये सादयेत् ।।९२।।
श्यामा क्रम की तरह इस पूजाक्रम में भी सामान्य और विशेष दो प्रकार
के अर्घ्य प्रदान की व्यवस्था करनी चाहिये।।९२।।
परामन्त्रेषु योजनीयबीजविशेषः
सर्वेऽपि पराक्रममनवः ‘सौः'वर्णपूर्वाः कार्याः ।।९३।।
पराक्रम में जितने मन्त्रों के निर्देश हैं, उन सबके पहले पराबीज ‘सौः’
का प्रयोग आवश्यक होता है।।९३।।
विशेषार्घ्ये श्यामातोयोऽधिकांशस्तमाह
भृगुचतुर्दशषोडशद्विरावृत्त्या वर्णषडङ्गं सर्वमूलषडावृत्त्या
मन्त्रषडङ्गं च कृत्वा ।।९४।।
भृगुः सकारः। चतुर्दशः औकारः। षोडशो विसर्गः। एतेषां प्रत्येकं
द्विरावृत्त्या हृदयादि-षडङ्गं कुर्यात्। अथ वर्णषडङ्गन्यासः। बिन्दुयोगश्च
शिष्टसम्प्रदायात्। मन्त्रस्वरूपम्। सं हृदयाय नमः। औं शिरसे स्वाहा। औः
शिखायै वषट्। विसर्गस्य केवलस्यानुच्चार्यत्वात्। एवमग्रेऽपि। इति मूल-
वर्णषडङ्गन्यासः। मूलेष पुनः षडङ्गन्यासमाह—सर्वमूलेति।।९४।।