परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
सूत्र में चतुरस्र शब्द के प्रयोग पर बल दिया गया है। अर्थात् सभी प्रकार
के उपक्रमों में कुण्ड चतुरस्र ही होना चाहिये। नैमित्तिक और काम्य प्रयोगों में
कभी इसका अपवाद भी पाया जाता है, जैसे पुत्रसन्तति परम्परा की कामना
में योनिरूप ही कुण्ड बनाया जा सकता है। सूत्रानुसारी निर्देश के अनुयायी
विद्यावान् विद्वान् यह भी मानते हैं कि, इसमें मण्डप की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि सूत्र में मण्डप की चर्चा नहीं है। अन्यत्र भी इसका निर्देश नहीं है,
न सूचना ही है।।२।।
सामान्योदकेनावोक्षणम्
सामान्यार्घ्यमुपशोध्य तेनावोक्ष्य ।।३।।
तत्तत्क्रमोक्तविधिना सामान्योदकं निर्मायेत्यर्थः। यदि पूजाङ्गहोमः, तदा
पूजायां कॢप्तेनैव कार्यसिद्धौ न निर्माणम्, अन्यत्र निर्माणमिति ज्ञेयम् ।।३।।
जिस क्रम की पूजा का विधान हो, उसमें सामान्य जल लेकर उसे शुद्ध
कर उससे पूजा द्रव्य का उच्छन करना चाहिये। किसी पूजा के अङ्गरूप में यदि
होम का विधान किया गया हो, तो जो जल प्रयुक्त हो रहा है, उसी से अवोक्षण
होना चाहिये।।३।।
रेखासु ब्रह्मादिदेवतार्चनम्
प्राचीरुदीचीस्तिस्रस्तिस्रो रेखा लिखित्वा ।।४।।
पूर्व और उत्तर तीन-तीन रेखायें खींचनी चाहिये। प्रथम प्रागग्र रेखा और
प्रथम उदगग्र के क्रम से इन पर देवों का आवाहन करने का विधान शास्त्र
में निर्दिष्ट है।।४।।
तासु रेखासु ब्रह्मयमसोमरुद्रविष्ण्विन्द्रान् षट्तारी नमः
सम्पुटितानभ्यर्च्य¹ ।।५।।
षट्तारी कुमारी प्रथमं ततो ब्रह्मणे नम इति। एवञ्च षट्तारनमः-
सम्पुटिता भवन्ति। एवमेव यमायेत्यादौ योज्यम्। नमःसम्पुटितानित्यनन्तरं
१. श्रीक्रम-सूत्र. ८।