सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

२२० परशुरामकल्पसूत्रम्
षट्‌तारवाच उक्ताः। नमोमन्त्रेण नमोऽन्तमन्त्रेण। स्वयमेव नमोऽन्तमन्त्रं
विवृणोति—अमुकेत्यादिना। इत्थं च प्रथमं षट्‌तारी तत ऐं, तत
इष्टदेवतानाम, ततोऽग्निशब्दः, षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम, ततोऽग्निशब्दः
षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम द्वितीयान्तं, ततः कल्पयामीति।।९४।।
कुण्ड में प्रज्वलित अग्नि का संस्कार भी आवश्यक होता है। सूत्र में
पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, उपनयन, गोदान और
विवाह का सनामग्रहण उल्लेख है। इन संस्कारों के लिये मन्त्र का प्रयोग करना
आवश्यक है। सूत्रकार मन्त्र का निर्देश भी कर रहे हैं। उनके अनुसार सर्वप्रथम
षट्‌तारी का प्रयोग करना चाहिये। षट्‌तारी में त्रितारी और कुमारी दोनों आते
हैं। कई अवसरों पर इनके प्रयोग किये गये हैं। वस्तुतः त्रितारी में 'ऐं ह्रीं श्रीं'
ये बीजत्रितय आते हैं। इसी तरह कुमारी में 'ऐं क्लीं सौः' ये तीन बीज आते
हैं। इन दोनों को मिलाकर षट्‌तारी बीज मन्त्र बनते हैं। पहले षट्‌तारी इसके
बाद वाग्भव बीज 'ऐं' और इसके बाद अग्नि में षष्ठी विभक्ति लगाकर पुंसवन
आदि संस्कारों के नाम लेने चाहिये। उसके बाद 'कर्म कल्पयामि नमः' बोलकर
संस्कार सम्पन्न करना चाहिये। इस तरह 'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं हुताशनस्य
पुंसवनकर्म कल्पयामि नमः' यह मन्त्र बनता है। इसी क्रम में सभी संस्कारों
के मन्त्र बनते हैं। इनसे अग्नि का संस्कार होता है।।९४।।
परिषेचनादि
परिषिच्य परिस्तीर्य परिधाय ।।९५।।
परिषिच्य अनुक्तत्वादीशानीमारभ्य प्रदक्षिणं समन्तात् सामान्या-
र्घ्योदकेन। परिस्तीर्य परिस्तरणे एकैकदिशि चत्वारो दर्भाः, 'अग्निं
षोडशभिर्दर्भैः परितस्तु परिस्तरेत्' इति वचनात्। परिधाय श्रौतोक्तधर्मक-
समिद्भिः प्राग्वर्जं त्रिषु। क्रमादिकं काष्ठनियमः श्रौतात् ज्ञेयः।।९५।।
सूत्रकार ने परिषेचन, परिस्तरण और परिधान रूप तीन कार्यों का निर्देश
दिया है। इसमें विधि अनुक्त है। अतः गुरुपरम्परा के ही अनुसार ये तीनों कार्य
सम्पन्न करने चाहिये—
१. परिषेचन—ईशानकोण से सामान्य अर्घ्यजल से करना उचित है। इसमें
प्रदक्षिण क्रम अपनाने का निर्देश वृत्तिकार ने दिया है।