परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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'भृगु' शब्द 'स'वर्ण का द्योतक है। इसी तरह वर्ण सन्दर्भ में प्रयुक्त
'चतुर्दश' संख्या चौदहवें स्वर 'औ'कार की द्योतक है। 'षोडश' संख्या से
सोलहवें वर्ण विसर्ग का बोध होता है। तीनों मिलकर पराबीज 'सौः' का सङ्केत
करते हैं। स का हृदय में, औ का शिर पर, विसर्ग का शिखा में, पुनः स
का कवच में, औ का नेत्रत्रय में और विसर्ग का अस्त्र मन्त्र में प्रयोग करने
पर दो आवृत्ति हो जाती है। यह वर्ण षडङ्गन्यास माना जाता है। इसके उपरान्त
पूरे मूल से अर्थात् पराबीज से छः आवृत्ति होने पर मन्त्रषडङ्ग न्यास पूरा होता
है। इस तरह मन्त्र के वर्ण-वर्ण में जिस दिव्यता का शाश्वत उल्लास होता है,
उसे उपासक अपने शरीर में धारण कर दिव्यातिदिव्य हो जाता है॥१४॥
न्यस्तानां षडङ्गदेवीनां पूजामाह
उभाभ्यामर्चयित्वा ।।१५।।
मूलवर्णमूलाभ्यामित्यर्थः ।।१५।।
न्यस्त षडङ्ग देवियों का भावन कर पुनः मूल के वर्णों से और पुनः
मूल के साथ-साथ षडङ्ग देवियों का स्मरण करते हुए, पूर्ववत् न्यास का निर्देश
इस सूत्र में दिया गया है॥१५॥
अथ सुधादेवीपूजामाह
मूलमुच्चार्य तां चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशित-
हस्तद्वयां प्रसन्नां देवीं पूजयामि नमः स्वाहा इति सुधादेवीमभ्यर्च्य
तया सम्प्रोक्ष्य वरिवस्यावस्तूनि।।१६।।
मूलमुच्चार्येति। तया सुधादेव्या। वरिवस्यावस्तूनि पूजाद्रव्याणि।।१६।।
सुधा देवी की पूजा का निर्देश इस सूत्र में है। मूल का उच्चारण कर
श्रद्धा के चरम स्तरीय आवेश से आविष्ट होकर मूलवर्ण का उच्चारण कर सुधा
देवी का ध्यान करना चाहिये। यह ध्यानात्मक स्मरण बड़ा ही आकर्षक है। देवी
चिन्मयी है। वह आनन्दमयी है। प्रकाश और स्वातन्त्र्य ही चित् और आनन्द
माने जाते हैं। ऐसी प्रकाशानन्दमयी प्रसन्नमुद्रा में अपने दोनों हाथों में अमृत-
कलश और पिशित लिये हुए है। इतना स्मरण कर यह कहना चाहिये कि,