परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० परशुरामकल्पसूत्रम्
ओघत्रयाभ्यर्चनम्
दिव्यौघं तिस्रः पादुकाः, सिद्धौघं तिस्रः, मानवौघमष्टाव-
भ्यर्च्य ।। २५ ।।
दिव्यौघसिद्धौघमानवौघानामर्चनम् आवरणदेवतावदर्चनम्। विशेषार्घ्य-
द्रव्येण स्वहृदय एव कार्यम् ।। २५ ।।
दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ की पूजा क्रमशः तीन, तीन और आठ
की संख्या के कारण पृथक्-पृथक् इतने ही मन्त्रों से की जाती है। जैसे—
१. दिव्यौघ—इस पूजा में तीन पूज्य परिगणित हैं। अघोरानन्दनाथ,
श्रीकण्ठानन्दनाथ के पहले पराभट्टारिका की पूजा की जाती है। जैसे—
अ. सौः पराभट्टारिका-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
आ. अघोरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
इ. श्रीकण्ठानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. सिद्धौघ—शक्तिधर, क्रोध, त्र्यम्बक ये तीन नाथ इसमें परिगणित हैं। इनके
मन्त्र भी पूर्ववत् बनाने चाहिये। उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—
‘सौः शक्तिधरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’। इसी प्रकार दोनों शेष
नाथों की पूजा करनी चाहिये।
३. मानवौघ—१. सौः आनन्दानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी तरह
२. प्रतिभादेव्यम्बानन्द, ३. वीरानन्द, ४. संविदानन्द, ५. मधुरा-
देव्यम्बानन्दनाथ, ६. ज्ञानानन्द, ७. श्रीरामानन्द, ८. योगानन्दनाथ सबके साथ
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाकर पूजा करनी चाहिये। यह तीनों ओघों
की पूजा है।। २५ ।।
दिव्यौघादीनाह
पराभट्टारिकाऽघोरश्रीकण्ठ-शक्तिधर-क्रोध-त्र्यम्बकनन्द-
प्रतिभादेव्यम्बा-वीर-संविदानन्द-मधुरादेव्यम्बा-ज्ञान-श्रीराम-योगा
इति परापादुकाः ।। २६ ।।