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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 320 में से

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पृष्ठ 255

होमविधिः
[ नवमः खण्डः ]
अथ गणपतिक्रमे नित्यहोमप्रसक्तौ ललिताऽऽदिपुरश्चरणाङ्गहोमस्य
अन्यत्र काम्यहोमस्य वा प्रसक्तौ तदितिकर्त्तव्यताज्ञानस्यावश्यकतया तदर्थं
होमविधिं वक्तुमारभते—
अथ स्वेष्टमन्त्रस्य होमविधानं व्याख्यास्यामः ।।१।।
अथेति पूर्वक्रान्तविच्छेदाद्योतकः। स्वेष्टमन्त्रस्येत्यनेन, अग्रे
सौरवैष्णवादिसर्वसाधारणोपासनाया वक्ष्यमाणत्वाद् अत्रापि सर्वसाधारणो
होमविधिरिति ज्ञापितः।।१।।
अथ शब्द पूर्व में उपक्रान्त विषय के अन्त और नूतन विषय के उपक्रम
का सूचक माना जाता है। सूत्र में निर्दिष्ट स्वेष्टमन्त्रोपासना के प्रयोग में होम
का विधान सभी सम्प्रदायों में है। जैसे सौर सूर्यमन्त्र-जपान्त में होम करते हैं,
इसी तरह वैष्णवादि सम्प्रदायों में भी यही क्रम अपनाया जाता है। इसे
सर्वसाधारण उपासना क्रम में स्वीकृत विधि कहते हैं। इसी आधार पर इस होम-
विधान को भी सर्वसाधारण होम विधान मानना चाहिये।।१।।
ततस्तद्विधिमाह
चतुरस्रं कुण्डमथवा हस्तायाममङ्गुष्ठोन्नतं स्थण्डिलं कृत्वा।।२।।
कुण्डमित्यनेन तन्त्रान्तरोक्तमेखलायोनिखातादिमतिदिष्टं नाम्ना। चतुरस्रं
नित्यम्। प्रजादिकामनायां योनिकुण्डादिकमपि। सूत्रानुयायिनां न मण्डप-
विचारः। अनुक्तत्वाद् असूचितत्वाच्च। आयामो विस्तारः।।२।।