परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भी सम्भव न हो, तो ब्राह्मण के घर से अग्नि ले आना चाहिये। अग्नि
को मृत्पात्र अथवा ताम्रपात्र में लाना चाहिये। अग्नि लाकर अग्नि, ईशान
या नैऋत्य में रखना चाहिये। उसमें से श्रुति-परम्परानुसार अमेध्य अंश को
क्रव्याद कोण में फेंककर कुण्ड में रखने के पहले उसका निरीक्षण, प्रोक्षण,
ताडन, अवकुण्ठन तथा धेनु और योनि मुद्रा विधियों से उसका विशोधन
भी कर लेना चाहिये।
तत्पश्चात् 'ॐ वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय
स्वाहा' इस मन्त्र से मूलाधार चक्र से उद्गत संवित् रूप चिदग्नि को भ्रूमध्यनेत्र
द्वारा निकाल कर उस बाह्य अग्नि में मिलाकर कुण्ड में उसका संपात करना
चाहिये।।९।।
इन्धनैराच्छादनम्
कवचमन्त्रेण इन्धनैराच्छाद्य ।।१०।।
कवचमन्त्रेण 'हुं' इत्यनेन।।१०।।
कवचमन्त्रेण इस तृतीयान्त प्रयोग से यह प्रतीत होता है कि, इस बीज
मन्त्र में आच्छादन के साधकतमत्व की व्याप्ति है। इसके द्वारा आच्छादित होना
एक रहस्यभरा आध्यात्मिक प्रयोग है।।१०।।
अथोपस्थानमाह
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
सुवर्णवर्णमनिलं समिद्धं विश्वतोमुखम्।। इत्युपस्थाय ।।११।।
उपस्थानं नाम अग्नेरपरभागे कृताञ्जलेस्तिष्ठतो मन्त्रपाठः ।।११।।
'मैं प्रज्वलित अग्नि की वन्दना कर रहा हूँ। अग्नि जातवेद (जातवेदस्)
है। यह ज्ञानरूप है। यह हुताशन है। दी हुई आहुतियों का प्राशन कर देवताओं
तक पहुँचाता है। यह सोने के समान सुन्दर है। इसे अनल कहते हैं। अच्छी
तरह प्रज्वलित है और चारों ओर से इन्धन को ग्रास बनाकर आत्मसात् करता
है।' इस श्लोकरूप मन्त्र से इस तरह प्रार्थना करते हुए उसके पास अञ्जलिबद्ध
बैठने की मुद्रा का नाम ही उपस्थान है।।११।।