परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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योज्यम्। एवं हृदये षट्त्रिंशद्वारं मूलेन निरुक्तषट्त्रिंशत्तत्त्वमन्त्रैश्च कुसुमानां
प्रक्षेप एव पराचक्रनिर्मितिरिति भावः। तानि चेत्यत्र लिङ्गव्यत्यय आर्षः।
षट्त्रिंशत्तत्त्वान्याह—पृथिवीति शिव इत्यन्तेन। यद्यपि तन्त्रान्तरे शिवादि-
पृथिव्यन्तक्रमस्तत्त्वानाम्स्ति, तथापि प्रकृतेऽनेनैव क्रमेण मन्त्रैः पुष्प-
क्षेपोऽपूर्वसाधनमिति विपरीतपाठः। तत्स्वरूपं व्याख्यातं प्राक्॥१८॥
परा चक्र का यह निर्माण शिव संकल्प प्रकल्प का अनूठा उदाहरण है।
कुसुमक्षेप द्वारा आराध्य चक्र के निर्माण की योजना अन्यत्र दुर्लभ है। सर्वप्रथम
मूल मन्त्र का एक बार प्रयोग कर कुसुमक्षेप करने के उपरान्त सूत्रोक्त सभी
तत्त्वपीठों के मन्त्रों से कुसुमक्षेप करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार होंगे, जैसे—
१. ‘सौः पृथिवीयोगपीठाय नमः’ मन्त्र बोलकर कुसुमक्षेप करना चाहिये।
२. ‘सौः अप्योगपीठाय नमः’ (कुमुमक्षेप)।
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