परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपराक्रमः २११
१. पराभट्टारिका, अघोरा, श्रीकण्ठ इति दिव्यौघः।
२. शक्तिधरः, क्रोधः, त्र्यम्बक इति सिद्धौघः।
३. आनन्दः, प्रतिभादेव्यम्बा, वीरः, संविदानन्दः, मधुरादेव्यम्बा, ज्ञानः,
श्रीरामः, योग इति मानवौघः।।२६।।
सूत्र २५ के अर्थ के साथ दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के क्रमशः
तीन, तीन, आठ अर्चनीय नाथों के नाम दे दिये गये हैं। मन्त्रों की योजना
भी वहीं द्रष्टव्य है।।२६।।
बलिदानम्
ततः कलामनुना बलिं निवेद्य ।।२७।।
ततः अर्चनानन्तरम्। कलामनुना 'सौः' इत्यनेन 'पातु मां परमा कला'
इत्यत्र परायाः कलापदवाच्यत्वं निर्णीतम्। अतस्तन्मनुरसावेव भवितुमर्हति।
बलिदाने धर्माः श्रीक्रमोक्ता ग्राह्याः, साजात्यात्। अत्र जपस्य उपासनाकालस्य
वाऽनुक्तेरयं प्रयोगः सकृदेव। यद्वा, श्यामावार्त्तालीसाहचर्यात् जपसङ्ख्या
अनुक्ता तत्रत्या ग्राह्या। तावज्जपपर्यन्तोपास्तिः। अत एवाग्रे सूत्रकारो जपकालं
वक्ष्यति।।२७।।
ततः अर्थात् परादेव्यम्बा के अर्चन के उपरान्त ही बलिकर्म करना चाहिये।
इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये—
१. बलि कलामन्त्र से होनी चाहिये।
२. कला पराम्बा को भी कहते हैं। यही मन्त्र 'सौः' है।
३. 'पातु मां परमाकला' के उद्धरण में पराम्बा को ही परमा कला कहते हैं।
४. बलिदान श्रीक्रम के अनुसार करना चाहिये।
५. जप और उपासना के समय अनुक्त हैं। अतः ये कार्य एक बार ही करणीय हैं।
६. जपसंख्या श्यामावार्त्तालीवत् होनी चाहिये।।२७।।
हविःशेषस्वीकारः
हविःशेषमात्मसात्कुर्यात्। इति शिवम् ।।२८।।