परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
ललिताक्रमः
[ चतुर्थः खण्डः ]
हृदि स्थिताया देवतायाः श्रीचक्रे आवाहनप्रकारं दर्शयितुमुपक्रमते
अथ हृच्चक्रस्थितामन्तस्सुषुम्णा-पद्माटवीनिर्भेदन-कुशलां
निरस्तमोहतिमिरां शिवदीपदीप्तिमाद्यां संविदं वह्रन्नासापुटेन निर्गमय्य
लीलाकलितवपुषं तां त्रिखण्डमुद्राशिखण्डे कुसुमाञ्जलौ हस्ते
समानीय ।।१।।
अथेति क्रमविशेषद्योतकम्। हृच्चक्रम् अनाहतं तत्र स्थिताम्। अन्तः
सुषुम्णायां यानि पद्मानि तेषामटवी दुर्गमं वर्त्म तस्य निर्भेदनं गमनानुकूलवर्त्म-
सम्पादनं तद्विषये कुशलाम्, निरस्तो दूरीकृतो मोहोऽज्ञानं तदेव तिमिरं यया
ताम्। शिवात्मको यो दीपस्तस्य दीप्तिं प्रकाशरूपाम्। यथा दीपप्रभयो-
रविनाभावसम्बन्धः, एवं शिवशक्त्योरप्यविनाभावः सूचितः। आद्याम् अपरि-
च्छिन्नां संविदं नासापुटेन वहन्। लीलया स्वेच्छामात्रेण आकलितं स्वीकृतं
वपुषं त्रिखण्डा जन्ममृत्युजरा, यद्वा सत्त्वरजस्तमोगुणान् खण्डयतीति
केवलमोक्षप्रदेत्यर्थः। यद्वा त्रीणि खण्डानि इच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मिका। मोदनाद्
द्रावणाद्वा मुद्रा तया शिखण्डिते। अञ्जलौ हस्ते समानीय।।१।।
श्रीचक्र में जिस देवता की पूजा की जाती है, वह हृदय में शाश्वत रूप
से प्रतिष्ठित परा देवता ही है। उसी का आवाहन श्रीचक्र में करते हैं। तत्पश्चात्
उसकी पूजा की जाती है। इसी आवाहन प्रकार के वर्णन का उपक्रम यहाँ कर
रहे हैं।
अथ शब्द ललिताक्रम के द्योतन के प्रारम्भ अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है। हृच्चक्र
अनाहत को कहते हैं। (वस्तुतः हृत् शरीर का परा केन्द्र है। मेरुदण्ड के मध्य
में यह रहता है। अनाहत उसकी छाया है)। मेरुदण्ड में अवस्थित हृत् केन्द्र
में सुषुम्ना के आन्तर पद्म का दुर्गम पथ योगियों की साधना से ही प्रकाशित
होता है। साधना के अभाव में ही उसे 'अटवी' कहा जा सकता है। उस अटवी
का भेदन माँ के अनुग्रह पर ही निर्भर करता है। इस भेदन प्रक्रिया में वही
कुशल है। हृदय केन्द्र से सहस्रार तक की यात्रा में गमन के अनुकूल पथ
सम्बन्धी सारी साधन सुविधाओं को देने में एकमात्र अधिकारिणी परमाम्बा का
अनुग्रह निरन्तर अपेक्षित होता है।
मोह, अज्ञान के अन्धकार से उत्पन्न होने वाला माया का मोहक पुत्र माना
जाता है। यह अज्ञता को और भी घना बना देता है। ऐसे अन्धतमस् का विनाश
माँ ही कर सकती है और साधक की विनम्र पुकार के सुनते ही उसे तुरत निरस्त
कर देती है। उसका परिचय भौतिक स्तर के उपासक दीप की दीप्तिरूप आभा
को देखकर पा सकते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, दीप और दीप्ति का
अविनाभाव सम्बन्ध है। जहाँ दीप की लौ जलेगी, आभा अपनी चमक चारों ओर
फैलाकर ही रहेगी, उसी तरह भगवान् का अस्तित्व शाश्वत रूप से विश्व में व्याप्त
है। यह व्यापक शिव का स्वरूप है। शिव की व्याप्ति ही शैवमहाभाव की दीप्ति
है। अतः शिव और माँ भगवती शक्ति का भी अविनाभाव सम्बन्ध है। यह बात
साधक उपासक को अपने मन में बिठला लेनी चाहिये। उस शक्ति को आद्या
संविद् अपरिच्छिन्न चिति कहते हैं।
उस आद्या शक्ति को ही प्राणापानवाह के माध्यम से साधक अनुशासित
रूप से वहन करता है। श्वास प्रक्रिया का महत्त्व जीवधारियों के लिये तो है
ही; किन्तु योगी श्वास साधना में संलग्न रहकर प्रतिपल परमाम्बा का वात्सल्य
पीयूष पीता रहता है। इस श्वास के निर्गमन में जीवन का रहस्य निहित रहता
है। यह सोचने की बात है कि, अपान चन्द्र पर चढ़कर प्राण का सूरज भी
शरीर से निर्गमन व्यापार के माध्यम से बाहर आ जाता है। उस समय शरीर
में श्वास नहीं रहता है। वह शरीर से बाहर मध्य द्वादशान्त में समा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में जब सूर्य-चन्द्र दोनों अस्त होते हैं। तो अमावास्या होती है।
तन्त्र, जब प्राणापानरूप रवि-सोम अस्त होकर मध्य द्वादशान्त में समा जाते
हैं, तो उस बिन्दु को अमा-केन्द्र कहता है। अमा-केन्द्र ही जीवन का उत्स
है। वहाँ महाशैव-सद्भाव की व्याप्ति भी मानते हैं। योगी साधक लीलापूर्वक
१०० परशुरामकल्पसूत्रम्
अर्थात् अपनी स्वतन्त्रता शक्ति के बल पर इसे आकलित अर्थात् स्वीकार करते
हैं। शरीर में योगी ऐसे शिव का प्रति श्वास में साक्षात्कार करता है। प्रति श्वास
के प्रथम उन्मेष को प्रतिपदा कहते हैं। यह शैव दीप की दीप्ति मानी जाती
है। प्रतिपदा से पूर्णिमा तक कृष्णपक्ष तन्त्र की दृष्टि से मानते हैं और यही
शाक्त व्याप्ति है। श्वास के उद्गम-निर्गम रूप एक प्राणापानवाह में व्याप्त इस
रूप का साक्षात्कार करने में समर्थ व्यक्ति ही श्रीचक्र की साधना कर सकता
है। इसलिये श्रीविद्या-साधना का अधिकार प्राप्त करना इसकी पहली शर्त है।
ऐसे शिवदीपदीप्ति-रूप शिव-शक्ति के इस अविनाभावी रूप को साधक
अपने हाथ की फूलों से भरी अंजुलि में आवाहित करने में सफल हो जाता
है। यह अंजुलि भी त्रिखण्ड मुद्रा शिखण्डित होती है। त्रिखण्ड पारिभाषिक शब्द
है। मुद्रा शब्द भी मोदन और द्रावण के अन्वर्थ से विभूषित है। इच्छा, ज्ञान
और क्रिया रूप तीन खण्डों में क्रिया शक्ति विश्वामर्श में मोदन और द्रावण
व्यापार को शिखण्डित अर्थात् ग्रथित करती है।
जन्म, मृत्यु और जरा, अथवा सत्त्व, रज और तम आदि तीन अन्य
खण्ड भी माने जा सकते हैं। इनको खण्डित करने वाली अर्थात् केवल मोक्षप्रदा
मुद्रा ही त्रिखण्ड मुद्रा मानी जा सकती है। योगिनीतन्त्र के अनुसार चिदात्म भित्ति
में विश्व का प्रकाश और विमर्श स्वेच्छा से करने वाली पूर्ण विविकीर्षा से
समन्वित क्रियाशक्ति ही मोदन और द्रावण करने के कारण मुद्रा मानी जाती
है। यही त्रिखण्डा भी मानी जाती है। यह क्रियाशक्ति का अदृष्ट रूप है। बाह्य
रूप में वह कुसुमाञ्जलिपूर्ण हाथ में ही आवाहित की जाती है॥१॥
मायालक्ष्मीपरा उच्चार्य देवी नाम चामृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नम इति कल्पयित्वा ।।२।।
"माया ह्रीं, लक्ष्मी श्रीं, परा सौः। एवं बीजत्रयम् उच्चार्य देवी नाम
शक्तिचक्रैकनायिकाया ललितायाः (च उच्चार्य) अमृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नमः" इति त्रयस्त्रिंशद्वर्णो मन्त्रः। तन्मन्त्रमुच्चार्य देवीं कल्पयित्वा।।२।।
इस सूत्र में पूर्व स्वीकृत त्रितारी का ग्रहण नहीं किया गया है।
परम्परानुसार उसे लगाकर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—"ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं
सौः शक्तिचक्रैकनायिकाया ललिताया अमृतचैतन्यमूर्त्तिं कल्पयामि नमः" यह ३३
ललिताक्रमः १०१
वर्णों का महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना जाता है। इस सूत्र के अनुसार यह सिद्ध होता
है कि, सर्वप्रथम इस मन्त्र से मूर्ति-प्रकल्पन करने के बाद उपासक उस कल्पित
मूर्ति को नासापुट से बाहर करता है और उसे फूलों से भरी अंजलि वाले हाथों
में समानयन करता है। यही क्रम परम्पराप्राप्त क्रम है॥२॥
हसरयुजं वाचं हसयुक्तां कलरीं हसरचतुर्दशषोडशानप्युच्चार्य,
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे।
सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
इति बैन्दवचक्रे परचितिमावाह्य॥३॥
हश्च सश्च रश्च तैर्युतं वाचं 'हस्त्रैं'। हश्च सश्च आभ्यां युक्तो ककारलकार-
रेफेकार-बिन्दुसमुदायः 'हस्क्लरीं'। तथा हश्च सश्च रश्च, चतुर्दश औकारः
षोडशो विसर्गः 'हस्त्रौः' इति एतानुच्चार्य परमेश्वरीत्यन्तं यथासूत्रं पठित्वा
बिन्दुचक्रे परचितिमावाहयेत्॥३॥
सूत्र के अनुसार पूरा मन्त्र 'ऐं ह्रीं श्रीं हस्त्रैं हस्क्लरीं हस्त्रौः' बनता है।
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे। सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
उक्त मन्त्र के साथ यह श्लोक भी बोलते हैं। तब पूरा मन्त्र बनता है।
श्लोकार्थ के सम्बन्ध में सेतुबन्ध का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है। वह महापद्मवन
को सहस्रार मानता है। कारणानन्द अपरिच्छिन्न आनन्द है। यह अनुत्तर परमशिव
का स्वातन्त्र्य है। माँ ललिताम्बा का विग्रह उसी में उल्लसित है। ऐसी वात्सल्य-
मयी परमेश्वरी माँ का बीजमन्त्रों के रथ पर आवाहन उपासक की अनुभूति का
विषय है॥३॥
चतुष्षष्ट्युपचारविधिः
चतुष्षष्ट्युपचारान् कुर्यात्। सर्वे उपचारमन्त्राः। त्रितारी पूर्वाः
कल्पयामि नम इत्यन्ताः कर्त्तव्याः ।।४।।
चतुष्षष्ट्युपचारमध्ये एकस्याप्ययो मा भवत्वित्यत्रैव तात्पर्यम्।
उपचारपदार्थश्च कल्प्यमानद्रव्येण सुखविशेषः, तं कुर्याद् उत्पादयेद् इत्यर्थः।
शेषं स्पष्टम्।।४।।
१०२ परशुरामकल्पसूत्रम्
पाँचवाँ सूत्र चौंसठ उपचारों का निर्देश करता है। यह सूत्र उसी सूत्र का
पूरक है। यह आज्ञा देता है कि, इन सभी उपचारों का प्रयोग आवश्यक है।
इनके सभी मन्त्रों से पूर्व त्रितारी (ऐं ह्रीं श्रीं) का प्रयोग अनिवार्यतः आवश्यक
है तथा ‘कल्पयामि नमः’ तक मन्त्र पूरे होते हैं। यह ध्यान देने की बात है
कि, मन्त्र के माध्यम से वस्तु-समर्पण द्वारा आराध्य को जो सुख मिलता है,
उसे उपचार कहते हैं।।४।।
त्रितारीमुच्चार्य पाद्यं कल्पयामि नम इति क्रमेण आभरणा-
वरोपणं सुगन्धितैलाभ्यङ्गं मज्जनशालाप्रवेशनं मज्जनमण्डपमणि-
पीठोपवेशनं दिव्यस्नानीयोद्वर्त्तनम् उष्णोदकस्नानं कनककलश-
च्युतसकलतीर्थाभिषेकं धौतवस्त्रपरिमार्जनम् अरुणदुकूलपरिधानम्
अरुणकुचोत्तरीयमालेपमण्डपप्रवेशनमालेप-मण्डपमणिपीठोपवेशनं
चन्दनागुरु-कुङ्कुमसङ्गुमगमदकर्पूरकस्तूरी-गोरोचनादिदिव्यगन्ध-
सर्वाङ्गीणविलेपनं केशभरस्य कालागुरुधूपं मल्लिकामालतीजाती-
चम्पकाशोकशतपत्रपूगकुङ्मलीपुन्नाग-कह्लार-मुख्यसर्वर्तुकुसुममालां
भूषणमण्डपप्रवेशनं भूषणमण्डपमणिपीठोपवेशनं नवमणिमुकुटं
चन्द्रशकलं सीमन्तसिन्दूरं तिलकरत्नं कालाञ्जनं पालीयुगलं
मणिकुण्डलयुगलं नासाभरणम् अधरयावकं प्रथमभूषणं कनक-
चिन्ताकं पदकं महा-पदकं मुक्तावलिम् एकावलिं छन्नवीरं
केयूरयुगलचतुष्टयं वलयावलिम् ऊर्मिकावलिं काञ्चीदाम-कटिसूत्रं
सौभाग्याभरणं पादकटकं रत्ननूपुरं पादाङ्गुलीयकम् एककरे पाशम्
अन्यकरे अङ्कुशम् इतरकरे पुण्ड्रेक्षुचापम् अपरकरे पुष्पबाणान्
श्रीमन्माणिक्यपादुके स्वसमानवेषाभिरावरणदेवताभिः सह
महाचक्राधिरोहणं कामेश्वराङ्कपर्यङ्कोपवेशनम् अमृतासवचषकम्
आचमनीयं कर्पूरवीटिकाम् आनन्दोल्लासविलासहासं मङ्गलारार्तिकं
छत्रं चामरयुगलं दर्पणं तालवृन्तं गन्धं पुष्पं धूपं दीपं नैवेद्यं
कल्पयामि नम इति चतुष्षष्ट्युपचारान् विधाय ।।५।।
अत्र सामान्यपरिभाषयैव त्रितारीसिद्धौ पुनर्विधानं तदवयवत्वं ज्ञापयति।
शेषं स्पष्टम्। क्रमेण इत्यनेन पाद्यमिति स्थाने आभरणावरोपणादि-पदोच्चारणं
ललिताक्रमः १०३
ज्ञापयति। स्नानीयोद्वर्त्तनं शरीरलग्नस्नेहवियोगसाधनं सुगन्धिचूर्णविशेषः।
कुचोत्तरीयं कञ्चुकम्। आलेपः सुगन्धिद्रव्यशरीरसंयोगः। कुङ्कुमं काश्मीरम्।
सङ्कः वृक्षविशेषः। मृगमदः कस्तूर्यवान्तरभेदः। मल्लिकामालतीत्यादिना
षडृतुसमुद्भवकुसुमानि। पाली कर्णभूषणम्। प्रथमभूषणं मङ्गलसूत्रम्। पदकं
कण्ठभूषणम्। मुक्तावलिः एकावलिर्माला। छन्नवीरं भूषणम्। वलयावलिः
कङ्कणभूषणम्। ऊर्मिका अङ्गुलिभूषणम्। आयुधान्याह—पुण्ड्रेक्षुतः
पुष्पबाणपर्यन्तानि। अमृतासवो मद्यम्। कर्पूरवीटिकादयः॥५॥
सामान्यतया श्रीविद्या-साधना के परम्पराप्राप्त मन्त्रों में त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करते हैं। इस सूत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख कर दिया गया है। इससे
यह सूचित हो रहा है कि, इस प्रक्रिया का अवयवरूप ही त्रितारी बीज मन्त्र
है। इनका उच्चारण कर 'पाद्यं कल्पयामि' यह कहना चाहिये। बार-बार
'ललिताम्बायै नमः' यह उच्चारण आवश्यक नहीं किन्तु सुविधानुसार सभी
उपचारों के साथ कहने में कोई दोष भी नहीं। जैसे 'ऐं ह्रीं श्रीं पाद्यं कल्पयामि
ललिताम्बायै नमः' यह मन्त्र पाद्य के साथ बोलते हैं, उसी तरह 'आभरणं
कल्पयामि' के साथ भी उच्चारण करते हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः चौंसठ उपचारों
के साथ भी अपनायी जानी चाहिये। शेष क्रम स्पष्ट है।
सूत्र में प्रयुक्त मुख्य शब्दों के अर्थ जानना भी आवश्यक है। जैसे—
१. स्नानीयोद्वर्त्तन—सुगन्धित उबटन। इसे लगाकर नहाने से शरीर में पसीने
आदि की तैलिकता नष्ट हो जाती है।
२. कुचोत्तरीय—कञ्चुकरूप स्तनाच्छादक परिधान।
३. आलेपमण्डप—वह स्थान या कक्ष जहाँ माँ परमाम्बा के शरीर पर सुगन्धि
लेप कर मालिश की जाती है।
४. कुङ्कुम—कश्मीर में उत्पन्न रञ्जक द्रव्य।
५. सङ्क—विशेष वृक्ष जिसका चूर्ण उपलेप में काम आता है।
६. मृगमद—कस्तूरी का एक भेद।
७. सर्वाङ्गीण—सभी अङ्गों में लगाने योग्य।
८. कालागुरु—इसका धूप केशराशि को काला करता है।
१०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
९. मल्लिकामालती—आदि छः ऋतुओं में होने वाले पुष्पों के ये प्रतीक
संज्ञा शब्द हैं।
१०. सीमन्त—'माँड'संज्ञक शिर पर दोनों ओर केश करने से उभरी सीधी रेखा
जो मध्य में होती है।
११. तिलकरत्न—तिलक के स्थान पर रत्न।
१२. पाली—कपोलपाली को सजाने वाली कान की बाली।
१३. अधरयावक—होठों के रँगने का रंग, महावर।
१४. प्रथमभूषण—मङ्गल-सूत्र।
१५. पदक—कण्ठभूषण।
१६. महापदक—कण्ठा।
१७. मुक्तावलि—मुक्ता-माला।
१८. एकावलि—२७ मणियों की बाली या माला।
१९. छत्रवीर—दो भागों में बाँटने वाली छाती की माला।
२०. केयूर—बाहु के कड़े।
२१. वलयावलि—माला।
२२. ऊर्मिकावलि—घुँघुरुओं वाली माला।
२३. काञ्ची—करधनी।
२४. सौभाग्याभरण—जघनों पर लटकने वाले झुमके।
२५. पादकटक आदि—पैर के आभूषण आयुध—
१. पुण्ड्रेक्षु—गन्ना।
२. पुष्पबाण—पुष्प के बने पाँच फूलों में काम बाण।
३. पाश—बाँधने का रज्जु।
४. अंकुश—अंकुश (बरछी)।
आधार वस्तु—
१. पादुका—दो खड़ाऊँ
२. महाचक्र—जहाँ देवियों के साथ माँ आरोहण करती हैं।
ललिताक्रमः १०५
३. कामेश्वराङ्कपर्यङ्क—शक्ति की पर्यङ्क शक्तिमान् की गोद ही होती है।
पेय-
४. अमृतासव—द्राक्षासव मिला विशिष्ट मद्य।
५. आचमनीय—जल, जिसे विशेष रूप से माँ के पीने के लिये बनाया
जाता है।
उल्लासक साज-सज्जा-
१. हास्य और विनोद के साधन।
२. आरार्तिक्य—आरती।
३. छत्र, चामर आदि।
शृङ्गारसाधन-
१. दर्पण—मुख देखने का साधन (मुकुर)।
२. तालवृन्त—व्यजन। पञ्चोपचार में इसकी भी आवश्यकता होती है।
३. १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप, ५. नैवेद्य।
ये सब मिलाकर चौंसठ उपचार होते हैं। त्रितारी के साथ द्वितीयान्त
संज्ञावाचक उपचारों के नाम बोलकर 'कल्पयामि नमः' यह मन्त्रात्मक प्रयोग
करना चाहिये॥५॥
नवमुद्राप्रदर्शनम्
नवमुद्राश्च प्रदर्श्य ॥६॥
नवमुद्राः संक्षोभिण्यादि-योन्यन्ताः। चकारेण दशमीं त्रिखण्डां च
प्रदर्श्य। देव्या इति शेषः ॥६॥
मुद्रायें यद्यपि कई प्रकार की होती हैं। जैसे—गुरुवन्दन मुद्रा, अर्घ्यस्थापन
मुद्रा, अर्चन मुद्रा आदि; किन्तु यहाँ १. संक्षोभिणी, २. विद्राविणी,
३. आकर्षणी, ४. सर्ववशङ्करी, ५. सर्वोन्मादिनी, ६. महाङ्कुशा, ७. खेचरी,
८. सर्वबीजा और ९. योनि मुद्राओं रूप नव मुद्राओं की ही प्रायोगिकता का
निर्देश किया गया है। सूत्र में 'च' अव्यय के प्रयोग से यह अर्थ निकाला जा
सकता है कि, त्रिखण्डा मुद्रा का प्रयोग भी यहाँ करना चाहिये। इस तरह दश
१०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुद्राओं का ही प्रदर्शन यहाँ होना चाहिये। मुद्राओं के नाम के साथ 'सर्व'
शब्द के प्रयोग की भी प्रथा है। इन दशों के अतिरिक्त ग्रास, प्राण,
अपान, व्यान, उदान, समान, नाराच और चक्र मुद्रायें भी इसी वर्ग में
आती हैं।।६।।
त्रिधा सन्तर्पणम्
मूलेन त्रिधा सन्तर्प्य ।।७।।
बिन्दाविति शेषः।।७।।
सूत्र में सन्तर्पण का ही निर्देश है। सर्वप्रथम मूल बीज का उच्चारण और
इसके बाद तीन बार 'सन्तर्पयामि नमः' यह वाक्य प्रयोग किया जाता है। यहाँ
पूजन का विधान नहीं है। सन्तर्पण में बूँद मात्र का प्रक्षेप किया जाता है। पूजा
में बिन्दु, पुष्प और अक्षत का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ श्रीक्रम के प्रकरण
में मूल बीजमन्त्र गुरु द्वारा जानकर प्रयोग करना चाहिये।।७।।
षडङ्गपूजनमाह
देव्या अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि
पूजयित्वा ।।८।।
अत्र पूजनं नाम पुष्पाक्षतबिन्दुप्रक्षेप एव, न तु पञ्चोपचाराद्यर्पणरूपम्।
तस्मात् पूर्ववाक्ये तर्पणम्। पूजापदार्थश्च बिन्दुपुष्पाक्षतसमुदायप्रक्षेपः। इत्थम्
आदौ 'त्रितारी ततो हृन्मन्त्रस्ततो हृदयशक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि' इति
मन्त्रस्वरूपं ज्ञेयम्। अग्नीशेत्यत्र अग्न्यादिपदेन तत्तद्देवतासम्बन्धिदिशां
ग्रहणम्। दिक्षु इत्यनेन प्रागादिदिक्चतुष्टयग्रहणम्। षडङ्ग-युवतीनाम् अग्न्यादि-
चतस्रो विदिशः। मध्यं प्रागादिदिक्चतुष्टयं मिलित्वैकम्, इति षट् स्थानानि
ज्ञेयानि ।।८।।
यहाँ पूजन-क्रम में बिन्दुपुष्पाक्षत का प्रयोग करना चाहिये। पहले यह
बतलाया गया है, कि तर्पण में केवल बिन्दुओं का ही उपयोग किया जाता
है। यहाँ पूजन में पञ्चोपचार आदि उपचारों का प्रयोग नहीं होता। तर्पण और
ललिताक्रमः १०७
पूजन के इस अन्तर को समझकर ही इस प्रक्रिया में प्रवृत्त होना चाहिये, इस
तरह आदि में त्रितारी, पुनः हन्मन्त्र पुनः हृद् शक्ति 'श्रीपादुकां पूजयामि' कहने
से एक मन्त्र पूरा होता है। यही मन्त्र का स्वरूप है।
सूत्र में अग्नि आदि दिशाओं का उल्लेख किया गया है। इन दिशा-
कोण वाचक शब्दों से उन-उन देवताओं से सम्बन्धित दिशाओं का ग्रहण होता
है। षडङ्ग देवियों की ये चार दिशायें विदिशा कहलाती हैं। जहाँ तक मध्य
का प्रश्न है, मध्य वह बिन्दु है, जहाँ प्राची आदि चारों दिशायें एक बिन्दु
पर मिलती हैं, वही बिन्दु-मध्य कहलाता है। इस प्रकार छः स्थान और
षडङ्गपूजा सम्पन्न होती है। छः स्थान इस प्रकार माने जाते हैं—पूर्व, दक्षिण,
पश्चिम और उत्तर चारों मिलकर १ चार विदिशाएँ + १ मध्य = १+४+१=६ अङ्ग
माने जाते हैं। ये ही स्थान भी हैं॥८॥
नित्यापूजनम्
१. वाक्सकलहीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे 'सौः' इति कामेश्वरी
सर्वत्र नित्याश्रीपादुकेति योज्यम्। २. वाग्भगभुगे भगिनि भगोदरि
भगमाले भगावहे भगगुह्ये भगयोनि भगनिपातिनि सर्वभगवशङ्करि
भगरूपे नित्यक्लिन्ने भगस्वरूपे सर्वाणि भगानि मे ह्यानय वरदे रेते
सुरेते भगक्लिन्ने क्लिन्नद्रवे क्लेदय द्रावय अमोघे भगविच्चे
क्षुभक्षोभय सर्वसत्त्वान् भगेश्वरि ऐं ब्लूं जें ब्लूं में ब्लूं मों ब्लूं हें
ब्लूं हें क्लिन्ने सर्वाणि भगानि मे वशमानय स्त्रीं हर ब्लें ह्रीं
भगमालिनी। ३. तारो माया नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा इति
नित्यक्लिन्ना। ४. प्रणवः क्रों भ्रीं क्रौं झ्रौं छ्रौं ज्रौं स्वाहा, इति
भेरुण्डा। ५. प्रणवो माया वह्निवासिन्यै नम इति वह्निवासिनी।
६. मायाक्लिन्ने वाक् क्रों नित्यमदद्रवे ह्रीं, इति महावज्रेश्वरी।
७. माया शिवदूत्यै नमः, इति शिवदूती। ८. प्रणवो माया हुं खे
चे छे क्षः स्त्रीं हुं क्षें ह्रीं फट् इति त्वरिता। ९. कुमारी कुलसुन्दरी।
१०. हसकलरडवाग्भव ह स क ल र ड बिन्दुमालिनी। ह स क
ल र ड चतुर्दशषोडशा इति नित्या। ११. माया फ्रें स्स्रूं अंकुश
पाशास्मर वाग्भव ब्लूं पदनित्यमदद्रवे वर्म फ्रें मायेति नीलपताका।
१२. भमरयऊमिति विजया। १३. स्वौमिति सर्वमङ्गला।
१४. तारो नमो भगवति ज्वालामालिनि देवदेवि सर्वभूतसंहार-
कारिके जातवेदसि ज्वलन्ति ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल त्रिजातियुक्त
मायारेफसप्तकज्वालामालिनि वर्मफडग्निजायेति ज्वालामालिनी।
१५. (अं) च्कौं इति चित्रा। इति पञ्चदश नित्याः। प्रथमत्र्यस्ररेखा-
स्थितपञ्चदशस्वरेषु पूज्याः, विसृष्टौ षोडशीं मूलविद्यया
चाभ्यर्च्य ॥९॥
वाक् ऐं। शेषं यथापठितम्। मन्त्रान्ते सर्वत्र तत्तन्नित्यानाम। तदुत्तरं
अष्टाक्षरी-योगः। यथा आदौ त्रितारी ऐं सकल ह्रीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे सौः
कामेश्वरी नित्या श्रीपादुकां पूजयामि नम इति। एवमग्रेऽपि द्रष्टव्यम्। यद्यपि
श्रीपादु
ललिताक्रमः १०९
त्रिजातियुक्त- माया हां हीं हूं। वह्निजाया स्वाहा। पञ्चदशमाह—अं क्ष्कौमिति।
प्रथमत्यस्रं बिन्दुसमीपस्थं त्रिकोणम्। तत्रत्या या तिस्रो रेखास्तासु एकैकस्वरे
एकैकनित्याः क्रमेण पूज्याः। विसृष्टिः बिन्दुचक्रम्।।९।।
नित्यायें १५ होती हैं। श्रीचक्र के बैन्दव कोण भी तीनों रेखाओं पर
क्रमशः पश्चिम-ईशान रेखा पर 'अ आ इ ई उ' इन पाँच स्वरों की अवस्थिति
होती है। ईशान-अग्निरेखा पर ऊ ऋ ॠ लृ ॡ ये पाँच स्वर रहते हैं। अग्नि-
पश्चिम रेखा पर ए, ऐ, ओ, औ तथा अं ये पाँच स्वर प्रतिष्ठित रहते हैं।
इन्हीं स्वरों पर १५ नित्याओं का आवाहन-पूजन करना चाहिये। इस बिन्दु-
चक्र को षोडशी मूलविद्या से पूजित करते हैं—
पूर्व
ईशानकोण ई ऊ ऋ लृ ॡ अ अग्निकोण
उ ए
ई ऐ
इ ⊙ ओ
उत्तर बिन्दुचक्र दक्षिण
आ औ
अ अं
प
पश्चिम
अ = अग्निकोण; अ-ई = अग्नि-ईशान रेखा; ई = ईशानकोण;
प = पश्चिम; प ई = पश्चिम-ईशान रेखा
नित्याओं के क्रमशः नाम
१. कामेश्वरी—कामेश्वरी नित्या के मन्त्र में वाक् शब्द 'ऐं' बीज के लिये प्रयुक्त
है। पूरा मन्त्र स्पष्ट है। अन्त में सभी मन्त्रों में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः'
का प्रयोग करना चाहिये।
२. भगमालिनी—इस नाम की नित्या देवी का मन्त्र सबसे बड़ा है। इस
मन्त्र में भी वाक् शब्द 'ऐं' के लिये प्रयुक्त है। आदि में सभी मन्त्रों
में त्रितारी का प्रयोग आवश्यक है। अन्त में सभी नित्याओं के साथ
'श्रीपादुकां पूजयामि' इस अष्टाक्षरी का प्रयोग कर नमः जोड़कर मन्त्र पूरा
करते हैं।
११० परशुरामकल्पसूत्रम्
३. नित्यक्लिन्ना—इसके मन्त्र में तार का अर्थ प्रणव और माया का अर्थ
'ह्रीं' है। शेष स्पष्ट है।
४. भेरुण्डा—इस नित्या के मन्त्र में भी तार शब्द प्रयुक्त है। यह प्रणववाचक
है। शेष स्पष्ट है।
५. वह्निवासिनी—इसके मन्त्र में प्रणव के साथ माया अर्थात् 'ह्रीं' का प्रयोग
करना चाहिये। वाक् की जगह 'ऐं' लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लिन्ने ऐं क्रों नित्यमद्रवे ह्रीं महावज्रेश्वरी नित्या-श्रीपादुकां
पू. ामि नमः'।
६. वज्रेश्वरी—इसके मन्त्र में माया (ह्रीं) क्लिन्ने के बाद वाक् (ऐं) क्रौं
नित्यमद्रवे ह्रीं बीजों का प्रयोग करते हैं।
७. शिवदूती—सरलतम मन्त्र है। माया 'ह्रीं' अर्थ में प्रयुक्त है।
८. त्वरिता—इस मन्त्र में भी प्रणव और माया (ह्रीं) अपने बीजों के लिये
प्रयुक्त हैं। शेष स्पष्ट है।
९. कुलसुन्दरी—इस मन्त्र में भी त्रितारी आदि में और अष्टाक्षरी बाद में प्रयोग
करना चाहिये।
१०. नित्या—इस नित्या का नाम ही नित्या है। इसमें वाग्भव 'ऐं', मालिनी
'ई' और चतुर्दश 'औ' स्वर के साथ षोडशतम स्वर विसर्ग लगाया जाना
आवश्यक है। शेष सभी मन्त्रों के नियम इसमें भी प्रयोग में लाने चाहिये।
११. नीलपताका—इसके मन्त्र में माया 'ह्रीं' अङ्कुश 'क्रों' पाश 'आं' स्मर
'क्लीं' वाग्भव 'ऐं' वर्म 'हुं' माया 'ह्रीं' अर्थों में प्रयुक्त हैं।
१२. विजया—इसके मन्त्र में हल् वर्णों को एक साथ लिखना चाहिये। इस
तरह उसका स्वरूप भ्म्र्यूं या 'भ्म्यूँ' ऐसा बनेगा। शेष नियम पूर्ववत्
लगते हैं।
१३. सर्वमङ्गला—एक बीजमन्त्रात्मक इस मन्त्र के साथ भी त्रितारी, अष्टाक्षरी
आदि प्रयोग आवश्यक हैं।
१४. ज्वालामालिनी—तार से अग्निजाया तक यह मन्त्र है। कुछ सिद्ध इसे
'लक्ष्मण-रेखा' मन्त्र कहते हैं। श्री लक्ष्मण को यह विद्या सिद्ध थी। सिद्धि
ललिताक्रमः १११
के आधार पर रेखा से ज्वालायें फूट पड़ती थीं। इसमें आदि में तार अर्थात्
प्रणव लगता है। त्रिजातियुक्त माया की जगह हां हीं हूं ऐं और रेफसप्तक
अर्थात् सात बार र लिखते हैं। वर्म 'हुं' और अग्निजाया अर्थात् अन्त
में 'स्वाहा' लगाते हैं।
१५. चित्रा—एकाक्षर बीजमन्त्र में त्रितारी-अष्टाक्षरी योग आवश्यक है।
विसर्जन के लिये षोडशी विद्या का प्रयोग करना चाहिये ।।९।।
ओघत्रयपूजामाह
मध्ये प्राक्त्यस्रमध्यान्त मुनिवेदनागसङ्ख्यान् यथासम्प्रदायं
पादुकान् दिव्यसिद्धमानवौघसिद्धांमिष्ट्वा पश्चात् स्वशिरसि नाथं
यजेत्। एतल्लयाङ्गपूजनम् इति शिवम् ।।१०।।
पूर्वोक्तत्र्यस्रमध्यस्य अन्ते। मुनिः सप्त। वेद चत्वारः, अष्टौ संख्या यत्र
तान्। यथासम्प्रदायं पादुकाः। कादिहादिविद्याभेदेन पादुकानां गुरुमण्डलानां
भिन्नत्वाद् यस्य पुरुषस्य, परिगृहीता या याः पादुकास्तत्तल्लाभायेति। दिव्यांश्च
सिद्धांश्च इष्ट्वा पूजयित्वा। पश्चात् स्वशिरसि नाथं यजेत्। एतद् नवावरणपूजनं
लाभाङ्गपूजनं भवितुमर्हति। शिवमिति खण्डसमाप्तियोजकम्।।१०।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयानाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललिताक्रमो नाम
चतुर्थः खण्डः सम्पूर्णः।।४।।
पहले त्रिकोण की चर्चा की जा चुकी है। उसके मध्यभाग का वह अंश
जो अपने सामने, सर्वाधिक सामीप्य का माना जा सके, वहाँ कादि-हादि-विद्या
के सम्प्रदायानुसार सात, चार और आठ पादुकाओं का क्रम अपनाकर दिव्य,
सिद्ध और मानव के ओघ अर्थात् वर्ग की पूजा करनी चाहिये। सूत्र में मुनि
का सात, वेद का चार और नाग का आठ अर्थों में प्रयोग किया गया है।
सिद्धों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है—१. दिव्यसिद्ध, २. सिद्ध-
सिद्ध और ३. मानव-सिद्ध। दिव्यसिद्ध सात होते हैं। सिद्ध-सिद्ध ४ होते हैं
और मानव-सिद्ध ८ होते हैं। इनकी सम्प्रदायानुसार पादुका-पूजा निर्धारित है।
उसे सम्पन्न करना चाहिये।
११२ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्पश्चात् उपासक द्वारा अपने ही शिरोभाग में परमेश्वर भैरवनाथ की पूजा
करनी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त 'एतत्' शब्द के दो प्रकार के अन्वय हो सकते
हैं—१. यह ओघपादुका के बाद स्वात्मशिरोभाग में नाथ का अर्चन लयाङ्ग-
पूजन माना जाता है। २. एतत् का अर्थ यह आगे आने वाला आवरणरूप
पूजन लयाङ्ग-पूजन माना जाता है। लयाङ्ग तादात्म्यवत् ही अर्चन माना जाता
है। इस प्रकार यह ललिताक्रम का प्रकरण पूर्ण होता है। शिव इस खण्ड-
समाप्ति पर कल्याण करें।।१०।।
।।श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललिताक्रम नामक चतुर्थ खण्ड परिपूर्ण ।।४।।
।। इति शिवम् ।।
ललितानवावरणपूजाक्रमः
[ पञ्चमः खण्डः]
प्रथमावरणव्यष्टिपूजा
अथ प्राथमिके चतुरस्रे अणिमा-लघिमा-महिमेशित्व-प्राका-
म्येच्छाप्राप्ति-सर्वकामसिद्ध्यन्ता मध्यमे चतुरस्रे ब्राह्मयाद्या-
महालक्ष्म्यन्तास्तृतीये चतुरस्रे संक्षोभणद्रावणाकर्षणवश्योन्मादन-
महाङ्कुशखेचरीबीजयोनित्रिखण्डाः सर्वपूर्वास्ताः सम्पूज्याः ।। १ ।।
अथेति नवावरणपूजाधिकारद्योतकम्। चतुरस्रत्रयमध्ये प्राथमिके चतुरस्रे
सर्वबाह्ये अणिमेत्यारभ्य सर्वकामपर्यन्तं द्वन्द्वः, ते सर्वेऽपि सिद्ध्यन्ताः कार्याः।
सर्वेषां पदानामन्ते सिद्धिरिति योज्यम्। तथा च त्रितारी ततोऽणिमासिद्धि-
श्रीपादुकां पूजयामीति। एवमग्रेऽपि। अणिमादिपदत्रयं न मन्त्रन्तं किन्तु
डाबन्तम्। मध्यमे चतुरस्रे ब्राह्मयाद्याः (तद्यथा)—ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी
वैष्णवी तथा। वाराही चैव चेन्द्राणी चामुण्डा सप्तमातरः ।। महालक्ष्मी चेत्यष्टौ
मातरो मध्यचतुरस्रे पूज्याः।
तृतीये चतुरस्रे दशमुद्रापूजनमाह—तृतीये इति। सर्वशब्दः पूर्वं
यन्नामसु तास्तृतीये इति। त्रितार्युत्तरं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि
इति। सर्वसंक्षोभिणी एव वामाशक्तिरित्युच्यते। इति दशमुद्राः पूज्याः ।। १ ।।
परमाम्बा ललिता त्रिपुरसुन्दरी की पूजा के क्रम में यहाँ आवरण-पूजा की
चर्चा की जा रही है। सर्वप्रथम प्रथम आवरण की व्यष्टि पूजा का उल्लेख किया
जा रहा है। व्यष्टि पूजा में प्रतिशक्ति की, प्रतिसिद्धि की और प्रतिमुद्राओं की
११४ परशुरामकल्पसूत्रम्
पृथक्-पृथक् सनाम-ग्रहण पूजा करनी चाहिये। इस पूजा में तीन चतुर्भुज ऐसे
निर्मित किये जाते हैं कि, बीच में तीसरा चतुर्भुज हो। उसको मध्य का चतुर्भुज
चारों ओर घेर कर निर्मित हो। तीसरा इन दोनों को चारों ओर से घेर कर
बना हो।
जैसे— इस चित्र में तीन चतुर्भुज हैं—
प्रथम चतुरस्र अर्थात् संख्या ३ और २ को अपने गर्भ में रखने वाले
बाह्य चतुर्भुज में पश्चिम में अणिमासिद्धि की पूजा करनी चाहिये। पूजा के मन्त्रों
के नियम पर ध्यान देना चाहिये। जैसे सभी नामों के पहले सर्वप्रथम
त्रितारी + नाम के आदि अक्षर का बीज + सिद्धि का नाम + सिद्धि
शब्द + श्रीपादुकां पूजयामि + नमः। इस तरह अणिमा का मन्त्र ‘ऐं ह्रीं श्रीं अं
अणिमासिद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
लघिमामन्त्र—‘ऐं ह्रीं श्रीं लं लघिमासिद्धिश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
इसी प्रकार सभी सिद्धियों के मन्त्र स्वयम् उपासक बनाकर प्रयोग करे। गुरुदेव
से इसे प्रमाणित करा ले।
पश्चिम में अणिमा में वशित्व, ऊ लघिमा, पूर्व में महिमा, दक्षिण
में ईशित्व, वायव्य और ईशान में प्राकाम्य, अग्नि में भुक्ति, नैऋत्य में इच्छा,
नीचे प्राप्ति और ऊर्ध्व में सर्वकामसिद्धियों का पूजन होना चाहिये। इस प्रकार
से दश सिद्धियों की पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
मध्यचतुर्भुज में आठ मातृकाओं की पूजा होती है। मातृकाओं के नाम-
१. ब्राह्मी, २. माहेश्वरी ३. कौमारी, ४. वैष्णवी, ५. वाराही, ६. इन्द्राणी मध्य
चतुरस्र में १. ब्राह्मी पश्चिम द्वार में, २. माहेश्वरी उत्तर द्वार में, ३. कौमारी
ललितानवावरणपूजाक्रमः ११५
पूर्वद्वार में, ४. वैष्णवी दक्षिण द्वार में, ५. वायव्य में वैष्णवी, ६. ईशान में
इन्द्राणी, ७. अग्नि में चामुण्डा और ८. नैऋत्य में महालक्ष्मी की पूजा करनी
चाहिये। इन शक्तियों की पूजा के मन्त्र, जैसे ब्राह्मी-मन्त्र—
ऐं, ह्रीं, श्रीं, आं ब्राह्मी मातृशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः। मन्त्र क्रम
त्रितारी दीर्घस्वराष्टाक्षरी + मातृनाम + श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी प्रकार
अपनाना चाहिये। त्रितारी ऐं ह्रीं श्रीं स्वराष्टाक्षरी आं, ईं, ऊं (ॠं लूं ऐं औं
अः) सभी मातृकाओं के मन्त्र इसी क्रम से बन जाते हैं।
तृतीय चतुरस्र में मुद्राओं की पूजा का विधान है। मुद्रायें निम्नलिखित हैं—
१. सर्वसंक्षोभिणी, २. सर्वविद्राविणी, ३. सर्वाकर्षिणी, ४. सर्ववशङ्करी,
५. सर्वोन्मादिनी, ६. सर्वमहाङ्कुशा ७. सर्वखेचरी, ८. सर्वबीजा, ९. सर्वयोनि-
मुद्रा और १०. सर्वत्रिखण्डा।
इन सभी मुद्राओं में सर्व का प्रयोग आदि में करना चाहिये। यह परम्परा
है। वस्तुतः नाम में सर्व नहीं प्रयोज्य है। इनके मन्त्र में त्रितारी आदि में अवश्य
लगाना चाहिये। अन्त में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' सभी मुद्राओं के अन्त में
उच्चारित होगा। उदाहरण रूप में सर्वसंक्षोभिणी मन्त्र इस प्रकार से बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः'। इसी तरह सभी मुद्राओं के
मन्त्र बनते हैं।।१।।
प्रथमावरणस्य व्यष्टिपूजामुक्त्वा समष्टिपूजामाह
एताः प्रकटयोगिन्यस्त्रैलोक्यमोहनचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः
सन्विति, तासामेव समष्ट्यर्चनं कृत्वा ।।२।।
एता अणिमादित्रिखण्डान्ताः। प्रकटयोगिन्यस्तासामेव समष्टिनाम
प्रकटयोगिन्य इति। उक्तयोगिनीषु प्रकटत्वं च शिवादिषट्त्रिंशत्तत्त्वानां मध्ये या
स्थूला पृथिवी तद्रूपे भूपुरे चतुरस्रे वर्तमानत्वात्। त्रैलोक्यमोहनमिति योग
रूढिभ्यां चतुरस्रत्रयात्मकं सर्वबाह्यं यच्चक्रं तस्य नाम। तासामणिमादि-
त्रिखण्डान्तानां समष्ट्यर्चनं विधाय ।।२।।
११६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अणिमा से लेकर त्रिखण्डा पर्यन्त ये दश योगिनियाँ प्रकट योगिनियाँ
मानी जाती हैं। इसका कारण है, यह सारा विश्वात्मक विस्तार छत्तीस तत्त्वात्मक
माना जाता है। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह विस्तार शिव के स्वातन्त्र्य का
चमत्कार है। इसमें पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है। अन्तिम स्थूल तत्त्व रूप भूपुर में
यह चतुरस्र भूपुर निर्मित होता है। उसी में ये योगिनियाँ वर्त्तमान होती हैं। इसी
आधार पर इन्हें प्रकट योगिनी संज्ञा प्रदान की गयी है। जहाँ तक 'त्रैलोक्य-
मोहन' चक्र का प्रश्न है, यह तीन चतुरस्रों का सबसे बाहर वाला चक्र ही
इस संज्ञा से विभूषित किया गया है। इसी चक्र में इन समस्त प्रकट योगिनियों
की पूजा की जाती है। यह पूजा समष्टि पूजा कही जाती है। समष्टि शब्द व्यष्टि
समूह में प्रयुक्त होता है। जब योगिनियों की एक-एक कर पृथक्-पृथक् पूजा
की जाती है, तो उसे व्यष्टि पूजा कहते हैं। यहाँ प्रकट योगिनी कह देने से
अणिमा से त्रिखण्डा पर्यन्त सबका बोध हो जाता है और मुद्रा, सिद्धि, आयुध,
शक्ति, वाहन और परिवार के सहित सबकी पूजा एक साथ की जानी चाहिये,
यह सूत्र का निर्देश है॥२॥
करशुद्धिमुच्चार्य त्रिपुराचक्रेश्वरीमवमृश्य द्रामिति सर्व-
संक्षोभिणीमुद्रां प्रदर्शयेत्। चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि।
शिष्टं समानम् ॥३॥
अत्र करशुद्धिपदेन करशुद्धिन्यासाङ्गभूतो मन्त्रः, तम् उच्चार्य (अं आं
सौः) इति त्रिपुरेति त्रैलोक्यमोहनचक्रनायिका। त्रिपुरा चासौ चक्रेश्वरीमवमृश्य
सम्पूज्य। अत्रापि पूजारूपत्वात् श्रीपादुकेति मन्त्रशेषोऽस्ति परन्तु समष्ट्यर्चने
नास्ति।
द्रामिति सर्वसंक्षोभिणी-मुद्राबीजं तां पठित्वा मुद्राः प्रदर्शयेत्।
चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि शिष्टं समानम् ॥३॥
सूत्र में करशुद्धि मात्र का उल्लेख है। इससे प्रसङ्गवश करशुद्धि का वह
मन्त्र जिससे करशुद्धि और न्यास किया जाता है, उसे उच्चारण करना चाहिये।
वह मन्त्र 'अं आं सौः' है। यह बीजात्मक मन्त्र है।
त्रैलोक्यमोहनचक्र की नायिका का नाम ही त्रिपुरा है। वही चक्रेश्वरी भी
है। इन दोनों शब्दों में कर्मधारय समास है। अवमृश्य अवमृश की पूर्वकालिक
ललितानवावरणपूजाक्रमः ११७
क्रिया है। अवमर्श आन्तरिक स्पन्द रूप होता है। किन्तु यहाँ पूजा अर्थ में प्रयुक्त
माना जाता है।
सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा अङ्गुलियों को ग्रथित करने से बनती है। मुद्रा का
बीज 'द्रां' है। बीज मन्त्र उच्चारण कर मुद्रा प्रदर्शन करना चाहिये। इससे
परमाम्बा त्रिपुरा प्रसन्न होती हैं। यह क्रम सभी चक्रों, समस्त योगिनियों और
चक्रेश्वरी के पूजन में अपनाना चाहिये। सभी के भिन्न-भिन्न नाम हैं। यथा सन्दर्भ
सभी के विषय की जानकारी लेनी चाहिये। हाँ यह ध्यान देने की बात है कि,
समुद्रा, सपरिवारा आदि शब्दों के वर्ण कूट समान रूप से प्रयुक्त होते हैं। उन
उन प्रकरणों में समान विधि अपनायी जानी चाहिये।।३।।
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
षोडशपत्रे कामाकर्षिणी नित्याकलेति नित्याकलान्ताः,
बुद्ध्याकर्षिणी, अहङ्काराकर्षिणी, शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी,
रूपाकर्षिणी, रसाकर्षिणी, गन्धाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी,
धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी,
आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी, एता गुप्तयोगिन्यः
सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्रा इत्यादि पूर्ववद् आत्मरक्षामुच्चार्य
त्रिपुरेशीमिष्ट्वा 'द्रीं' इति सर्वविद्याविद्राविणीं प्रदर्शयेत् ।।४।।
नित्याकलेति वर्णसमुदायः। बुद्ध्याकर्षिणीतः पञ्चदशसु इदं विशेषणम्
अनुयोज्यम्। एता गुप्तयोगिन्यो भूपुरापेक्षया षोडशदलस्य अन्तःस्थत्वेन
गुप्ताः। पूर्ववद् द्वितीयसूत्रोक्तवद् आत्मरक्षामन्त्रः (श्रीक्रमोक्तसूत्रषोडशवत्)
उच्चार्य। सर्वविद्राविणीं मुद्रां प्रदर्शयेत् ।।४।।
श्रीचक्र के सोलह पत्रों में सोलह गुप्त योगिनियों की पूजा करनी चाहिये।
सूत्र के निर्देशानुसार सभी नामों के साथ नित्याकला शब्द का उच्चारण आवश्यक
माना जाता है। इन योगिनियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—
१. कामाकर्षिणी, २. बुद्ध्याकर्षिणी, ३. अहङ्काराकर्षिणी,
४. शब्दाकर्षिणी, ५. स्पर्शाकर्षिणी, ६. रूपाकर्षिणी, ७. रसाकर्षिणी,
८. गन्धाकर्षिणी, ९. चित्ताकर्षिणी, १०. धैर्याकर्षिणी ११. स्मृत्याकर्षिणी,