परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १०१
वर्णों का महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना जाता है। इस सूत्र के अनुसार यह सिद्ध होता
है कि, सर्वप्रथम इस मन्त्र से मूर्ति-प्रकल्पन करने के बाद उपासक उस कल्पित
मूर्ति को नासापुट से बाहर करता है और उसे फूलों से भरी अंजलि वाले हाथों
में समानयन करता है। यही क्रम परम्पराप्राप्त क्रम है॥२॥
हसरयुजं वाचं हसयुक्तां कलरीं हसरचतुर्दशषोडशानप्युच्चार्य,
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे।
सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
इति बैन्दवचक्रे परचितिमावाह्य॥३॥
हश्च सश्च रश्च तैर्युतं वाचं 'हस्त्रैं'। हश्च सश्च आभ्यां युक्तो ककारलकार-
रेफेकार-बिन्दुसमुदायः 'हस्क्लरीं'। तथा हश्च सश्च रश्च, चतुर्दश औकारः
षोडशो विसर्गः 'हस्त्रौः' इति एतानुच्चार्य परमेश्वरीत्यन्तं यथासूत्रं पठित्वा
बिन्दुचक्रे परचितिमावाहयेत्॥३॥
सूत्र के अनुसार पूरा मन्त्र 'ऐं ह्रीं श्रीं हस्त्रैं हस्क्लरीं हस्त्रौः' बनता है।
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे। सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
उक्त मन्त्र के साथ यह श्लोक भी बोलते हैं। तब पूरा मन्त्र बनता है।
श्लोकार्थ के सम्बन्ध में सेतुबन्ध का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है। वह महापद्मवन
को सहस्रार मानता है। कारणानन्द अपरिच्छिन्न आनन्द है। यह अनुत्तर परमशिव
का स्वातन्त्र्य है। माँ ललिताम्बा का विग्रह उसी में उल्लसित है। ऐसी वात्सल्य-
मयी परमेश्वरी माँ का बीजमन्त्रों के रथ पर आवाहन उपासक की अनुभूति का
विषय है॥३॥
चतुष्षष्ट्युपचारविधिः
चतुष्षष्ट्युपचारान् कुर्यात्। सर्वे उपचारमन्त्राः। त्रितारी पूर्वाः
कल्पयामि नम इत्यन्ताः कर्त्तव्याः ।।४।।
चतुष्षष्ट्युपचारमध्ये एकस्याप्ययो मा भवत्वित्यत्रैव तात्पर्यम्।
उपचारपदार्थश्च कल्प्यमानद्रव्येण सुखविशेषः, तं कुर्याद् उत्पादयेद् इत्यर्थः।
शेषं स्पष्टम्।।४।।