सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

१०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
९. मल्लिकामालती—आदि छः ऋतुओं में होने वाले पुष्पों के ये प्रतीक
संज्ञा शब्द हैं।
१०. सीमन्त—'माँड'संज्ञक शिर पर दोनों ओर केश करने से उभरी सीधी रेखा
जो मध्य में होती है।
११. तिलकरत्न—तिलक के स्थान पर रत्न।
१२. पाली—कपोलपाली को सजाने वाली कान की बाली।
१३. अधरयावक—होठों के रँगने का रंग, महावर।
१४. प्रथमभूषण—मङ्गल-सूत्र।
१५. पदक—कण्ठभूषण।
१६. महापदक—कण्ठा।
१७. मुक्तावलि—मुक्ता-माला।
१८. एकावलि—२७ मणियों की बाली या माला।
१९. छत्रवीर—दो भागों में बाँटने वाली छाती की माला।
२०. केयूर—बाहु के कड़े।
२१. वलयावलि—माला।
२२. ऊर्मिकावलि—घुँघुरुओं वाली माला।
२३. काञ्ची—करधनी।
२४. सौभाग्याभरण—जघनों पर लटकने वाले झुमके।
२५. पादकटक आदि—पैर के आभूषण आयुध—
१. पुण्ड्रेक्षु—गन्ना।
२. पुष्पबाण—पुष्प के बने पाँच फूलों में काम बाण।
३. पाश—बाँधने का रज्जु।
४. अंकुश—अंकुश (बरछी)।
आधार वस्तु—
१. पादुका—दो खड़ाऊँ
२. महाचक्र—जहाँ देवियों के साथ माँ आरोहण करती हैं।