परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्पश्चात् उपासक द्वारा अपने ही शिरोभाग में परमेश्वर भैरवनाथ की पूजा
करनी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त 'एतत्' शब्द के दो प्रकार के अन्वय हो सकते
हैं—१. यह ओघपादुका के बाद स्वात्मशिरोभाग में नाथ का अर्चन लयाङ्ग-
पूजन माना जाता है। २. एतत् का अर्थ यह आगे आने वाला आवरणरूप
पूजन लयाङ्ग-पूजन माना जाता है। लयाङ्ग तादात्म्यवत् ही अर्चन माना जाता
है। इस प्रकार यह ललिताक्रम का प्रकरण पूर्ण होता है। शिव इस खण्ड-
समाप्ति पर कल्याण करें।।१०।।
।।श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का ललिताक्रम नामक चतुर्थ खण्ड परिपूर्ण ।।४।।
।। इति शिवम् ।।