परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १०३
ज्ञापयति। स्नानीयोद्वर्त्तनं शरीरलग्नस्नेहवियोगसाधनं सुगन्धिचूर्णविशेषः।
कुचोत्तरीयं कञ्चुकम्। आलेपः सुगन्धिद्रव्यशरीरसंयोगः। कुङ्कुमं काश्मीरम्।
सङ्कः वृक्षविशेषः। मृगमदः कस्तूर्यवान्तरभेदः। मल्लिकामालतीत्यादिना
षडृतुसमुद्भवकुसुमानि। पाली कर्णभूषणम्। प्रथमभूषणं मङ्गलसूत्रम्। पदकं
कण्ठभूषणम्। मुक्तावलिः एकावलिर्माला। छन्नवीरं भूषणम्। वलयावलिः
कङ्कणभूषणम्। ऊर्मिका अङ्गुलिभूषणम्। आयुधान्याह—पुण्ड्रेक्षुतः
पुष्पबाणपर्यन्तानि। अमृतासवो मद्यम्। कर्पूरवीटिकादयः॥५॥
सामान्यतया श्रीविद्या-साधना के परम्पराप्राप्त मन्त्रों में त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करते हैं। इस सूत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख कर दिया गया है। इससे
यह सूचित हो रहा है कि, इस प्रक्रिया का अवयवरूप ही त्रितारी बीज मन्त्र
है। इनका उच्चारण कर 'पाद्यं कल्पयामि' यह कहना चाहिये। बार-बार
'ललिताम्बायै नमः' यह उच्चारण आवश्यक नहीं किन्तु सुविधानुसार सभी
उपचारों के साथ कहने में कोई दोष भी नहीं। जैसे 'ऐं ह्रीं श्रीं पाद्यं कल्पयामि
ललिताम्बायै नमः' यह मन्त्र पाद्य के साथ बोलते हैं, उसी तरह 'आभरणं
कल्पयामि' के साथ भी उच्चारण करते हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः चौंसठ उपचारों
के साथ भी अपनायी जानी चाहिये। शेष क्रम स्पष्ट है।
सूत्र में प्रयुक्त मुख्य शब्दों के अर्थ जानना भी आवश्यक है। जैसे—
१. स्नानीयोद्वर्त्तन—सुगन्धित उबटन। इसे लगाकर नहाने से शरीर में पसीने
आदि की तैलिकता नष्ट हो जाती है।
२. कुचोत्तरीय—कञ्चुकरूप स्तनाच्छादक परिधान।
३. आलेपमण्डप—वह स्थान या कक्ष जहाँ माँ परमाम्बा के शरीर पर सुगन्धि
लेप कर मालिश की जाती है।
४. कुङ्कुम—कश्मीर में उत्पन्न रञ्जक द्रव्य।
५. सङ्क—विशेष वृक्ष जिसका चूर्ण उपलेप में काम आता है।
६. मृगमद—कस्तूरी का एक भेद।
७. सर्वाङ्गीण—सभी अङ्गों में लगाने योग्य।
८. कालागुरु—इसका धूप केशराशि को काला करता है।