परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १०५
३. कामेश्वराङ्कपर्यङ्क—शक्ति की पर्यङ्क शक्तिमान् की गोद ही होती है।
पेय-
४. अमृतासव—द्राक्षासव मिला विशिष्ट मद्य।
५. आचमनीय—जल, जिसे विशेष रूप से माँ के पीने के लिये बनाया
जाता है।
उल्लासक साज-सज्जा-
१. हास्य और विनोद के साधन।
२. आरार्तिक्य—आरती।
३. छत्र, चामर आदि।
शृङ्गारसाधन-
१. दर्पण—मुख देखने का साधन (मुकुर)।
२. तालवृन्त—व्यजन। पञ्चोपचार में इसकी भी आवश्यकता होती है।
३. १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप, ५. नैवेद्य।
ये सब मिलाकर चौंसठ उपचार होते हैं। त्रितारी के साथ द्वितीयान्त
संज्ञावाचक उपचारों के नाम बोलकर 'कल्पयामि नमः' यह मन्त्रात्मक प्रयोग
करना चाहिये॥५॥
नवमुद्राप्रदर्शनम्
नवमुद्राश्च प्रदर्श्य ॥६॥
नवमुद्राः संक्षोभिण्यादि-योन्यन्ताः। चकारेण दशमीं त्रिखण्डां च
प्रदर्श्य। देव्या इति शेषः ॥६॥
मुद्रायें यद्यपि कई प्रकार की होती हैं। जैसे—गुरुवन्दन मुद्रा, अर्घ्यस्थापन
मुद्रा, अर्चन मुद्रा आदि; किन्तु यहाँ १. संक्षोभिणी, २. विद्राविणी,
३. आकर्षणी, ४. सर्ववशङ्करी, ५. सर्वोन्मादिनी, ६. महाङ्कुशा, ७. खेचरी,
८. सर्वबीजा और ९. योनि मुद्राओं रूप नव मुद्राओं की ही प्रायोगिकता का
निर्देश किया गया है। सूत्र में 'च' अव्यय के प्रयोग से यह अर्थ निकाला जा
सकता है कि, त्रिखण्डा मुद्रा का प्रयोग भी यहाँ करना चाहिये। इस तरह दश