सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

१०० परशुरामकल्पसूत्रम्
अर्थात् अपनी स्वतन्त्रता शक्ति के बल पर इसे आकलित अर्थात् स्वीकार करते
हैं। शरीर में योगी ऐसे शिव का प्रति श्वास में साक्षात्कार करता है। प्रति श्वास
के प्रथम उन्मेष को प्रतिपदा कहते हैं। यह शैव दीप की दीप्ति मानी जाती
है। प्रतिपदा से पूर्णिमा तक कृष्णपक्ष तन्त्र की दृष्टि से मानते हैं और यही
शाक्त व्याप्ति है। श्वास के उद्गम-निर्गम रूप एक प्राणापानवाह में व्याप्त इस
रूप का साक्षात्कार करने में समर्थ व्यक्ति ही श्रीचक्र की साधना कर सकता
है। इसलिये श्रीविद्या-साधना का अधिकार प्राप्त करना इसकी पहली शर्त है।
ऐसे शिवदीपदीप्ति-रूप शिव-शक्ति के इस अविनाभावी रूप को साधक
अपने हाथ की फूलों से भरी अंजुलि में आवाहित करने में सफल हो जाता
है। यह अंजुलि भी त्रिखण्ड मुद्रा शिखण्डित होती है। त्रिखण्ड पारिभाषिक शब्द
है। मुद्रा शब्द भी मोदन और द्रावण के अन्वर्थ से विभूषित है। इच्छा, ज्ञान
और क्रिया रूप तीन खण्डों में क्रिया शक्ति विश्वामर्श में मोदन और द्रावण
व्यापार को शिखण्डित अर्थात् ग्रथित करती है।
जन्म, मृत्यु और जरा, अथवा सत्त्व, रज और तम आदि तीन अन्य
खण्ड भी माने जा सकते हैं। इनको खण्डित करने वाली अर्थात् केवल मोक्षप्रदा
मुद्रा ही त्रिखण्ड मुद्रा मानी जा सकती है। योगिनीतन्त्र के अनुसार चिदात्म भित्ति
में विश्व का प्रकाश और विमर्श स्वेच्छा से करने वाली पूर्ण विविकीर्षा से
समन्वित क्रियाशक्ति ही मोदन और द्रावण करने के कारण मुद्रा मानी जाती
है। यही त्रिखण्डा भी मानी जाती है। यह क्रियाशक्ति का अदृष्ट रूप है। बाह्य
रूप में वह कुसुमाञ्जलिपूर्ण हाथ में ही आवाहित की जाती है॥१॥
मायालक्ष्मीपरा उच्चार्य देवी नाम चामृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नम इति कल्पयित्वा ।।२।।
"माया ह्रीं, लक्ष्मी श्रीं, परा सौः। एवं बीजत्रयम् उच्चार्य देवी नाम
शक्तिचक्रैकनायिकाया ललितायाः (च उच्चार्य) अमृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नमः" इति त्रयस्त्रिंशद्वर्णो मन्त्रः। तन्मन्त्रमुच्चार्य देवीं कल्पयित्वा।।२।।
इस सूत्र में पूर्व स्वीकृत त्रितारी का ग्रहण नहीं किया गया है।
परम्परानुसार उसे लगाकर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—"ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं
सौः शक्तिचक्रैकनायिकाया ललिताया अमृतचैतन्यमूर्त्तिं कल्पयामि नमः" यह ३३