परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललितानवावरणपूजाक्रमः ११७
क्रिया है। अवमर्श आन्तरिक स्पन्द रूप होता है। किन्तु यहाँ पूजा अर्थ में प्रयुक्त
माना जाता है।
सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा अङ्गुलियों को ग्रथित करने से बनती है। मुद्रा का
बीज 'द्रां' है। बीज मन्त्र उच्चारण कर मुद्रा प्रदर्शन करना चाहिये। इससे
परमाम्बा त्रिपुरा प्रसन्न होती हैं। यह क्रम सभी चक्रों, समस्त योगिनियों और
चक्रेश्वरी के पूजन में अपनाना चाहिये। सभी के भिन्न-भिन्न नाम हैं। यथा सन्दर्भ
सभी के विषय की जानकारी लेनी चाहिये। हाँ यह ध्यान देने की बात है कि,
समुद्रा, सपरिवारा आदि शब्दों के वर्ण कूट समान रूप से प्रयुक्त होते हैं। उन
उन प्रकरणों में समान विधि अपनायी जानी चाहिये।।३।।
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
षोडशपत्रे कामाकर्षिणी नित्याकलेति नित्याकलान्ताः,
बुद्ध्याकर्षिणी, अहङ्काराकर्षिणी, शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी,
रूपाकर्षिणी, रसाकर्षिणी, गन्धाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी,
धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी,
आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी, एता गुप्तयोगिन्यः
सर्वाशापरिपूरके चक्रे समुद्रा इत्यादि पूर्ववद् आत्मरक्षामुच्चार्य
त्रिपुरेशीमिष्ट्वा 'द्रीं' इति सर्वविद्याविद्राविणीं प्रदर्शयेत् ।।४।।
नित्याकलेति वर्णसमुदायः। बुद्ध्याकर्षिणीतः पञ्चदशसु इदं विशेषणम्
अनुयोज्यम्। एता गुप्तयोगिन्यो भूपुरापेक्षया षोडशदलस्य अन्तःस्थत्वेन
गुप्ताः। पूर्ववद् द्वितीयसूत्रोक्तवद् आत्मरक्षामन्त्रः (श्रीक्रमोक्तसूत्रषोडशवत्)
उच्चार्य। सर्वविद्राविणीं मुद्रां प्रदर्शयेत् ।।४।।
श्रीचक्र के सोलह पत्रों में सोलह गुप्त योगिनियों की पूजा करनी चाहिये।
सूत्र के निर्देशानुसार सभी नामों के साथ नित्याकला शब्द का उच्चारण आवश्यक
माना जाता है। इन योगिनियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—
१. कामाकर्षिणी, २. बुद्ध्याकर्षिणी, ३. अहङ्काराकर्षिणी,
४. शब्दाकर्षिणी, ५. स्पर्शाकर्षिणी, ६. रूपाकर्षिणी, ७. रसाकर्षिणी,
८. गन्धाकर्षिणी, ९. चित्ताकर्षिणी, १०. धैर्याकर्षिणी ११. स्मृत्याकर्षिणी,