परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें११० परशुरामकल्पसूत्रम्
३. नित्यक्लिन्ना—इसके मन्त्र में तार का अर्थ प्रणव और माया का अर्थ
'ह्रीं' है। शेष स्पष्ट है।
४. भेरुण्डा—इस नित्या के मन्त्र में भी तार शब्द प्रयुक्त है। यह प्रणववाचक
है। शेष स्पष्ट है।
५. वह्निवासिनी—इसके मन्त्र में प्रणव के साथ माया अर्थात् 'ह्रीं' का प्रयोग
करना चाहिये। वाक् की जगह 'ऐं' लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लिन्ने ऐं क्रों नित्यमद्रवे ह्रीं महावज्रेश्वरी नित्या-श्रीपादुकां
पू. ामि नमः'।
६. वज्रेश्वरी—इसके मन्त्र में माया (ह्रीं) क्लिन्ने के बाद वाक् (ऐं) क्रौं
नित्यमद्रवे ह्रीं बीजों का प्रयोग करते हैं।
७. शिवदूती—सरलतम मन्त्र है। माया 'ह्रीं' अर्थ में प्रयुक्त है।
८. त्वरिता—इस मन्त्र में भी प्रणव और माया (ह्रीं) अपने बीजों के लिये
प्रयुक्त हैं। शेष स्पष्ट है।
९. कुलसुन्दरी—इस मन्त्र में भी त्रितारी आदि में और अष्टाक्षरी बाद में प्रयोग
करना चाहिये।
१०. नित्या—इस नित्या का नाम ही नित्या है। इसमें वाग्भव 'ऐं', मालिनी
'ई' और चतुर्दश 'औ' स्वर के साथ षोडशतम स्वर विसर्ग लगाया जाना
आवश्यक है। शेष सभी मन्त्रों के नियम इसमें भी प्रयोग में लाने चाहिये।
११. नीलपताका—इसके मन्त्र में माया 'ह्रीं' अङ्कुश 'क्रों' पाश 'आं' स्मर
'क्लीं' वाग्भव 'ऐं' वर्म 'हुं' माया 'ह्रीं' अर्थों में प्रयुक्त हैं।
१२. विजया—इसके मन्त्र में हल् वर्णों को एक साथ लिखना चाहिये। इस
तरह उसका स्वरूप भ्म्र्यूं या 'भ्म्यूँ' ऐसा बनेगा। शेष नियम पूर्ववत्
लगते हैं।
१३. सर्वमङ्गला—एक बीजमन्त्रात्मक इस मन्त्र के साथ भी त्रितारी, अष्टाक्षरी
आदि प्रयोग आवश्यक हैं।
१४. ज्वालामालिनी—तार से अग्निजाया तक यह मन्त्र है। कुछ सिद्ध इसे
'लक्ष्मण-रेखा' मन्त्र कहते हैं। श्री लक्ष्मण को यह विद्या सिद्ध थी। सिद्धि