परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः
[ चतुर्थः खण्डः ]
हृदि स्थिताया देवतायाः श्रीचक्रे आवाहनप्रकारं दर्शयितुमुपक्रमते
अथ हृच्चक्रस्थितामन्तस्सुषुम्णा-पद्माटवीनिर्भेदन-कुशलां
निरस्तमोहतिमिरां शिवदीपदीप्तिमाद्यां संविदं वह्रन्नासापुटेन निर्गमय्य
लीलाकलितवपुषं तां त्रिखण्डमुद्राशिखण्डे कुसुमाञ्जलौ हस्ते
समानीय ।।१।।
अथेति क्रमविशेषद्योतकम्। हृच्चक्रम् अनाहतं तत्र स्थिताम्। अन्तः
सुषुम्णायां यानि पद्मानि तेषामटवी दुर्गमं वर्त्म तस्य निर्भेदनं गमनानुकूलवर्त्म-
सम्पादनं तद्विषये कुशलाम्, निरस्तो दूरीकृतो मोहोऽज्ञानं तदेव तिमिरं यया
ताम्। शिवात्मको यो दीपस्तस्य दीप्तिं प्रकाशरूपाम्। यथा दीपप्रभयो-
रविनाभावसम्बन्धः, एवं शिवशक्त्योरप्यविनाभावः सूचितः। आद्याम् अपरि-
च्छिन्नां संविदं नासापुटेन वहन्। लीलया स्वेच्छामात्रेण आकलितं स्वीकृतं
वपुषं त्रिखण्डा जन्ममृत्युजरा, यद्वा सत्त्वरजस्तमोगुणान् खण्डयतीति
केवलमोक्षप्रदेत्यर्थः। यद्वा त्रीणि खण्डानि इच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मिका। मोदनाद्
द्रावणाद्वा मुद्रा तया शिखण्डिते। अञ्जलौ हस्ते समानीय।।१।।
श्रीचक्र में जिस देवता की पूजा की जाती है, वह हृदय में शाश्वत रूप
से प्रतिष्ठित परा देवता ही है। उसी का आवाहन श्रीचक्र में करते हैं। तत्पश्चात्
उसकी पूजा की जाती है। इसी आवाहन प्रकार के वर्णन का उपक्रम यहाँ कर
रहे हैं।
अथ शब्द ललिताक्रम के द्योतन के प्रारम्भ अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है। हृच्चक्र
अनाहत को कहते हैं। (वस्तुतः हृत् शरीर का परा केन्द्र है। मेरुदण्ड के मध्य