परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १०७
पूजन के इस अन्तर को समझकर ही इस प्रक्रिया में प्रवृत्त होना चाहिये, इस
तरह आदि में त्रितारी, पुनः हन्मन्त्र पुनः हृद् शक्ति 'श्रीपादुकां पूजयामि' कहने
से एक मन्त्र पूरा होता है। यही मन्त्र का स्वरूप है।
सूत्र में अग्नि आदि दिशाओं का उल्लेख किया गया है। इन दिशा-
कोण वाचक शब्दों से उन-उन देवताओं से सम्बन्धित दिशाओं का ग्रहण होता
है। षडङ्ग देवियों की ये चार दिशायें विदिशा कहलाती हैं। जहाँ तक मध्य
का प्रश्न है, मध्य वह बिन्दु है, जहाँ प्राची आदि चारों दिशायें एक बिन्दु
पर मिलती हैं, वही बिन्दु-मध्य कहलाता है। इस प्रकार छः स्थान और
षडङ्गपूजा सम्पन्न होती है। छः स्थान इस प्रकार माने जाते हैं—पूर्व, दक्षिण,
पश्चिम और उत्तर चारों मिलकर १ चार विदिशाएँ + १ मध्य = १+४+१=६ अङ्ग
माने जाते हैं। ये ही स्थान भी हैं॥८॥
नित्यापूजनम्
१. वाक्सकलहीं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे 'सौः' इति कामेश्वरी
सर्वत्र नित्याश्रीपादुकेति योज्यम्। २. वाग्भगभुगे भगिनि भगोदरि
भगमाले भगावहे भगगुह्ये भगयोनि भगनिपातिनि सर्वभगवशङ्करि
भगरूपे नित्यक्लिन्ने भगस्वरूपे सर्वाणि भगानि मे ह्यानय वरदे रेते
सुरेते भगक्लिन्ने क्लिन्नद्रवे क्लेदय द्रावय अमोघे भगविच्चे
क्षुभक्षोभय सर्वसत्त्वान् भगेश्वरि ऐं ब्लूं जें ब्लूं में ब्लूं मों ब्लूं हें
ब्लूं हें क्लिन्ने सर्वाणि भगानि मे वशमानय स्त्रीं हर ब्लें ह्रीं
भगमालिनी। ३. तारो माया नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा इति
नित्यक्लिन्ना। ४. प्रणवः क्रों भ्रीं क्रौं झ्रौं छ्रौं ज्रौं स्वाहा, इति
भेरुण्डा। ५. प्रणवो माया वह्निवासिन्यै नम इति वह्निवासिनी।
६. मायाक्लिन्ने वाक् क्रों नित्यमदद्रवे ह्रीं, इति महावज्रेश्वरी।
७. माया शिवदूत्यै नमः, इति शिवदूती। ८. प्रणवो माया हुं खे
चे छे क्षः स्त्रीं हुं क्षें ह्रीं फट् इति त्वरिता। ९. कुमारी कुलसुन्दरी।
१०. हसकलरडवाग्भव ह स क ल र ड बिन्दुमालिनी। ह स क
ल र ड चतुर्दशषोडशा इति नित्या। ११. माया फ्रें स्स्रूं अंकुश