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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 320 में से

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पृष्ठ 157

ललितानवावरणपूजाक्रमः ११५
पूर्वद्वार में, ४. वैष्णवी दक्षिण द्वार में, ५. वायव्य में वैष्णवी, ६. ईशान में
इन्द्राणी, ७. अग्नि में चामुण्डा और ८. नैऋत्य में महालक्ष्मी की पूजा करनी
चाहिये। इन शक्तियों की पूजा के मन्त्र, जैसे ब्राह्मी-मन्त्र—
ऐं, ह्रीं, श्रीं, आं ब्राह्मी मातृशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः। मन्त्र क्रम
त्रितारी दीर्घस्वराष्टाक्षरी + मातृनाम + श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी प्रकार
अपनाना चाहिये। त्रितारी ऐं ह्रीं श्रीं स्वराष्टाक्षरी आं, ईं, ऊं (ॠं लूं ऐं औं
अः) सभी मातृकाओं के मन्त्र इसी क्रम से बन जाते हैं।
तृतीय चतुरस्र में मुद्राओं की पूजा का विधान है। मुद्रायें निम्नलिखित हैं—
१. सर्वसंक्षोभिणी, २. सर्वविद्राविणी, ३. सर्वाकर्षिणी, ४. सर्ववशङ्करी,
५. सर्वोन्मादिनी, ६. सर्वमहाङ्कुशा ७. सर्वखेचरी, ८. सर्वबीजा, ९. सर्वयोनि-
मुद्रा और १०. सर्वत्रिखण्डा।
इन सभी मुद्राओं में सर्व का प्रयोग आदि में करना चाहिये। यह परम्परा
है। वस्तुतः नाम में सर्व नहीं प्रयोज्य है। इनके मन्त्र में त्रितारी आदि में अवश्य
लगाना चाहिये। अन्त में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः' सभी मुद्राओं के अन्त में
उच्चारित होगा। उदाहरण रूप में सर्वसंक्षोभिणी मन्त्र इस प्रकार से बनेगा 'ऐं
ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिणीशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि नमः'। इसी तरह सभी मुद्राओं के
मन्त्र बनते हैं।।१।।
प्रथमावरणस्य व्यष्टिपूजामुक्त्वा समष्टिपूजामाह
एताः प्रकटयोगिन्यस्त्रैलोक्यमोहनचक्रे समुद्राः ससिद्धयः
सायुधाः सशक्तयः सवाहनाः सपरिवाराः सर्वोपचारैः सम्पूजिताः
सन्विति, तासामेव समष्ट्यर्चनं कृत्वा ।।२।।
एता अणिमादित्रिखण्डान्ताः। प्रकटयोगिन्यस्तासामेव समष्टिनाम
प्रकटयोगिन्य इति। उक्तयोगिनीषु प्रकटत्वं च शिवादिषट्त्रिंशत्तत्त्वानां मध्ये या
स्थूला पृथिवी तद्रूपे भूपुरे चतुरस्रे वर्तमानत्वात्। त्रैलोक्यमोहनमिति योग
रूढिभ्यां चतुरस्रत्रयात्मकं सर्वबाह्यं यच्चक्रं तस्य नाम। तासामणिमादि-
त्रिखण्डान्तानां समष्ट्यर्चनं विधाय ।।२।।