परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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पृथक्-पृथक् सनाम-ग्रहण पूजा करनी चाहिये। इस पूजा में तीन चतुर्भुज ऐसे
निर्मित किये जाते हैं कि, बीच में तीसरा चतुर्भुज हो। उसको मध्य का चतुर्भुज
चारों ओर घेर कर निर्मित हो। तीसरा इन दोनों को चारों ओर से घेर कर
बना हो।
जैसे— इस चित्र में तीन चतुर्भुज हैं—
प्रथम चतुरस्र अर्थात् संख्या ३ और २ को अपने गर्भ में रखने वाले
बाह्य चतुर्भुज में पश्चिम में अणिमासिद्धि की पूजा करनी चाहिये। पूजा के मन्त्रों
के नियम पर ध्यान देना चाहिये। जैसे सभी नामों के पहले सर्वप्रथम
त्रितारी + नाम के आदि अक्षर का बीज + सिद्धि का नाम + सिद्धि
शब्द + श्रीपादुकां पूजयामि + नमः। इस तरह अणिमा का मन्त्र ‘ऐं ह्रीं श्रीं अं
अणिमासिद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
लघिमामन्त्र—‘ऐं ह्रीं श्रीं लं लघिमासिद्धिश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ बनेगा।
इसी प्रकार सभी सिद्धियों के मन्त्र स्वयम् उपासक बनाकर प्रयोग करे। गुरुदेव
से इसे प्रमाणित करा ले।
पश्चिम में अणिमा में वशित्व, ऊ लघिमा, पूर्व में महिमा, दक्षिण
में ईशित्व, वायव्य और ईशान में प्राकाम्य, अग्नि में भुक्ति, नैऋत्य में इच्छा,
नीचे प्राप्ति और ऊर्ध्व में सर्वकामसिद्धियों का पूजन होना चाहिये। इस प्रकार
से दश सिद्धियों की पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
मध्यचतुर्भुज में आठ मातृकाओं की पूजा होती है। मातृकाओं के नाम-
१. ब्राह्मी, २. माहेश्वरी ३. कौमारी, ४. वैष्णवी, ५. वाराही, ६. इन्द्राणी मध्य
चतुरस्र में १. ब्राह्मी पश्चिम द्वार में, २. माहेश्वरी उत्तर द्वार में, ३. कौमारी