परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमें यह रहता है। अनाहत उसकी छाया है)। मेरुदण्ड में अवस्थित हृत् केन्द्र
में सुषुम्ना के आन्तर पद्म का दुर्गम पथ योगियों की साधना से ही प्रकाशित
होता है। साधना के अभाव में ही उसे 'अटवी' कहा जा सकता है। उस अटवी
का भेदन माँ के अनुग्रह पर ही निर्भर करता है। इस भेदन प्रक्रिया में वही
कुशल है। हृदय केन्द्र से सहस्रार तक की यात्रा में गमन के अनुकूल पथ
सम्बन्धी सारी साधन सुविधाओं को देने में एकमात्र अधिकारिणी परमाम्बा का
अनुग्रह निरन्तर अपेक्षित होता है।
मोह, अज्ञान के अन्धकार से उत्पन्न होने वाला माया का मोहक पुत्र माना
जाता है। यह अज्ञता को और भी घना बना देता है। ऐसे अन्धतमस् का विनाश
माँ ही कर सकती है और साधक की विनम्र पुकार के सुनते ही उसे तुरत निरस्त
कर देती है। उसका परिचय भौतिक स्तर के उपासक दीप की दीप्तिरूप आभा
को देखकर पा सकते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, दीप और दीप्ति का
अविनाभाव सम्बन्ध है। जहाँ दीप की लौ जलेगी, आभा अपनी चमक चारों ओर
फैलाकर ही रहेगी, उसी तरह भगवान् का अस्तित्व शाश्वत रूप से विश्व में व्याप्त
है। यह व्यापक शिव का स्वरूप है। शिव की व्याप्ति ही शैवमहाभाव की दीप्ति
है। अतः शिव और माँ भगवती शक्ति का भी अविनाभाव सम्बन्ध है। यह बात
साधक उपासक को अपने मन में बिठला लेनी चाहिये। उस शक्ति को आद्या
संविद् अपरिच्छिन्न चिति कहते हैं।
उस आद्या शक्ति को ही प्राणापानवाह के माध्यम से साधक अनुशासित
रूप से वहन करता है। श्वास प्रक्रिया का महत्त्व जीवधारियों के लिये तो है
ही; किन्तु योगी श्वास साधना में संलग्न रहकर प्रतिपल परमाम्बा का वात्सल्य
पीयूष पीता रहता है। इस श्वास के निर्गमन में जीवन का रहस्य निहित रहता
है। यह सोचने की बात है कि, अपान चन्द्र पर चढ़कर प्राण का सूरज भी
शरीर से निर्गमन व्यापार के माध्यम से बाहर आ जाता है। उस समय शरीर
में श्वास नहीं रहता है। वह शरीर से बाहर मध्य द्वादशान्त में समा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में जब सूर्य-चन्द्र दोनों अस्त होते हैं। तो अमावास्या होती है।
तन्त्र, जब प्राणापानरूप रवि-सोम अस्त होकर मध्य द्वादशान्त में समा जाते
हैं, तो उस बिन्दु को अमा-केन्द्र कहता है। अमा-केन्द्र ही जीवन का उत्स
है। वहाँ महाशैव-सद्भाव की व्याप्ति भी मानते हैं। योगी साधक लीलापूर्वक