परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुद्राओं का ही प्रदर्शन यहाँ होना चाहिये। मुद्राओं के नाम के साथ 'सर्व'
शब्द के प्रयोग की भी प्रथा है। इन दशों के अतिरिक्त ग्रास, प्राण,
अपान, व्यान, उदान, समान, नाराच और चक्र मुद्रायें भी इसी वर्ग में
आती हैं।।६।।
त्रिधा सन्तर्पणम्
मूलेन त्रिधा सन्तर्प्य ।।७।।
बिन्दाविति शेषः।।७।।
सूत्र में सन्तर्पण का ही निर्देश है। सर्वप्रथम मूल बीज का उच्चारण और
इसके बाद तीन बार 'सन्तर्पयामि नमः' यह वाक्य प्रयोग किया जाता है। यहाँ
पूजन का विधान नहीं है। सन्तर्पण में बूँद मात्र का प्रक्षेप किया जाता है। पूजा
में बिन्दु, पुष्प और अक्षत का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ श्रीक्रम के प्रकरण
में मूल बीजमन्त्र गुरु द्वारा जानकर प्रयोग करना चाहिये।।७।।
षडङ्गपूजनमाह
देव्या अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि
पूजयित्वा ।।८।।
अत्र पूजनं नाम पुष्पाक्षतबिन्दुप्रक्षेप एव, न तु पञ्चोपचाराद्यर्पणरूपम्।
तस्मात् पूर्ववाक्ये तर्पणम्। पूजापदार्थश्च बिन्दुपुष्पाक्षतसमुदायप्रक्षेपः। इत्थम्
आदौ 'त्रितारी ततो हृन्मन्त्रस्ततो हृदयशक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि' इति
मन्त्रस्वरूपं ज्ञेयम्। अग्नीशेत्यत्र अग्न्यादिपदेन तत्तद्देवतासम्बन्धिदिशां
ग्रहणम्। दिक्षु इत्यनेन प्रागादिदिक्चतुष्टयग्रहणम्। षडङ्ग-युवतीनाम् अग्न्यादि-
चतस्रो विदिशः। मध्यं प्रागादिदिक्चतुष्टयं मिलित्वैकम्, इति षट् स्थानानि
ज्ञेयानि ।।८।।
यहाँ पूजन-क्रम में बिन्दुपुष्पाक्षत का प्रयोग करना चाहिये। पहले यह
बतलाया गया है, कि तर्पण में केवल बिन्दुओं का ही उपयोग किया जाता
है। यहाँ पूजन में पञ्चोपचार आदि उपचारों का प्रयोग नहीं होता। तर्पण और