परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १११
के आधार पर रेखा से ज्वालायें फूट पड़ती थीं। इसमें आदि में तार अर्थात्
प्रणव लगता है। त्रिजातियुक्त माया की जगह हां हीं हूं ऐं और रेफसप्तक
अर्थात् सात बार र लिखते हैं। वर्म 'हुं' और अग्निजाया अर्थात् अन्त
में 'स्वाहा' लगाते हैं।
१५. चित्रा—एकाक्षर बीजमन्त्र में त्रितारी-अष्टाक्षरी योग आवश्यक है।
विसर्जन के लिये षोडशी विद्या का प्रयोग करना चाहिये ।।९।।
ओघत्रयपूजामाह
मध्ये प्राक्त्यस्रमध्यान्त मुनिवेदनागसङ्ख्यान् यथासम्प्रदायं
पादुकान् दिव्यसिद्धमानवौघसिद्धांमिष्ट्वा पश्चात् स्वशिरसि नाथं
यजेत्। एतल्लयाङ्गपूजनम् इति शिवम् ।।१०।।
पूर्वोक्तत्र्यस्रमध्यस्य अन्ते। मुनिः सप्त। वेद चत्वारः, अष्टौ संख्या यत्र
तान्। यथासम्प्रदायं पादुकाः। कादिहादिविद्याभेदेन पादुकानां गुरुमण्डलानां
भिन्नत्वाद् यस्य पुरुषस्य, परिगृहीता या याः पादुकास्तत्तल्लाभायेति। दिव्यांश्च
सिद्धांश्च इष्ट्वा पूजयित्वा। पश्चात् स्वशिरसि नाथं यजेत्। एतद् नवावरणपूजनं
लाभाङ्गपूजनं भवितुमर्हति। शिवमिति खण्डसमाप्तियोजकम्।।१०।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयानाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) ललिताक्रमो नाम
चतुर्थः खण्डः सम्पूर्णः।।४।।
पहले त्रिकोण की चर्चा की जा चुकी है। उसके मध्यभाग का वह अंश
जो अपने सामने, सर्वाधिक सामीप्य का माना जा सके, वहाँ कादि-हादि-विद्या
के सम्प्रदायानुसार सात, चार और आठ पादुकाओं का क्रम अपनाकर दिव्य,
सिद्ध और मानव के ओघ अर्थात् वर्ग की पूजा करनी चाहिये। सूत्र में मुनि
का सात, वेद का चार और नाग का आठ अर्थों में प्रयोग किया गया है।
सिद्धों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है—१. दिव्यसिद्ध, २. सिद्ध-
सिद्ध और ३. मानव-सिद्ध। दिव्यसिद्ध सात होते हैं। सिद्ध-सिद्ध ४ होते हैं
और मानव-सिद्ध ८ होते हैं। इनकी सम्प्रदायानुसार पादुका-पूजा निर्धारित है।
उसे सम्पन्न करना चाहिये।