परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिताक्रमः १०९
त्रिजातियुक्त- माया हां हीं हूं। वह्निजाया स्वाहा। पञ्चदशमाह—अं क्ष्कौमिति।
प्रथमत्यस्रं बिन्दुसमीपस्थं त्रिकोणम्। तत्रत्या या तिस्रो रेखास्तासु एकैकस्वरे
एकैकनित्याः क्रमेण पूज्याः। विसृष्टिः बिन्दुचक्रम्।।९।।
नित्यायें १५ होती हैं। श्रीचक्र के बैन्दव कोण भी तीनों रेखाओं पर
क्रमशः पश्चिम-ईशान रेखा पर 'अ आ इ ई उ' इन पाँच स्वरों की अवस्थिति
होती है। ईशान-अग्निरेखा पर ऊ ऋ ॠ लृ ॡ ये पाँच स्वर रहते हैं। अग्नि-
पश्चिम रेखा पर ए, ऐ, ओ, औ तथा अं ये पाँच स्वर प्रतिष्ठित रहते हैं।
इन्हीं स्वरों पर १५ नित्याओं का आवाहन-पूजन करना चाहिये। इस बिन्दु-
चक्र को षोडशी मूलविद्या से पूजित करते हैं—
पूर्व
ईशानकोण ई ऊ ऋ लृ ॡ अ अग्निकोण
उ ए
ई ऐ
इ ⊙ ओ
उत्तर बिन्दुचक्र दक्षिण
आ औ
अ अं
प
पश्चिम
अ = अग्निकोण; अ-ई = अग्नि-ईशान रेखा; ई = ईशानकोण;
प = पश्चिम; प ई = पश्चिम-ईशान रेखा
नित्याओं के क्रमशः नाम
१. कामेश्वरी—कामेश्वरी नित्या के मन्त्र में वाक् शब्द 'ऐं' बीज के लिये प्रयुक्त
है। पूरा मन्त्र स्पष्ट है। अन्त में सभी मन्त्रों में 'श्रीपादुकां पूजयामि नमः'
का प्रयोग करना चाहिये।
२. भगमालिनी—इस नाम की नित्या देवी का मन्त्र सबसे बड़ा है। इस
मन्त्र में भी वाक् शब्द 'ऐं' के लिये प्रयुक्त है। आदि में सभी मन्त्रों
में त्रितारी का प्रयोग आवश्यक है। अन्त में सभी नित्याओं के साथ
'श्रीपादुकां पूजयामि' इस अष्टाक्षरी का प्रयोग कर नमः जोड़कर मन्त्र पूरा
करते हैं।