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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 320 में से

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पृष्ठ 158

११६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अणिमा से लेकर त्रिखण्डा पर्यन्त ये दश योगिनियाँ प्रकट योगिनियाँ
मानी जाती हैं। इसका कारण है, यह सारा विश्वात्मक विस्तार छत्तीस तत्त्वात्मक
माना जाता है। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह विस्तार शिव के स्वातन्त्र्य का
चमत्कार है। इसमें पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है। अन्तिम स्थूल तत्त्व रूप भूपुर में
यह चतुरस्र भूपुर निर्मित होता है। उसी में ये योगिनियाँ वर्त्तमान होती हैं। इसी
आधार पर इन्हें प्रकट योगिनी संज्ञा प्रदान की गयी है। जहाँ तक 'त्रैलोक्य-
मोहन' चक्र का प्रश्न है, यह तीन चतुरस्रों का सबसे बाहर वाला चक्र ही
इस संज्ञा से विभूषित किया गया है। इसी चक्र में इन समस्त प्रकट योगिनियों
की पूजा की जाती है। यह पूजा समष्टि पूजा कही जाती है। समष्टि शब्द व्यष्टि
समूह में प्रयुक्त होता है। जब योगिनियों की एक-एक कर पृथक्-पृथक् पूजा
की जाती है, तो उसे व्यष्टि पूजा कहते हैं। यहाँ प्रकट योगिनी कह देने से
अणिमा से त्रिखण्डा पर्यन्त सबका बोध हो जाता है और मुद्रा, सिद्धि, आयुध,
शक्ति, वाहन और परिवार के सहित सबकी पूजा एक साथ की जानी चाहिये,
यह सूत्र का निर्देश है॥२॥
करशुद्धिमुच्चार्य त्रिपुराचक्रेश्वरीमवमृश्य द्रामिति सर्व-
संक्षोभिणीमुद्रां प्रदर्शयेत्। चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि।
शिष्टं समानम् ॥३॥
अत्र करशुद्धिपदेन करशुद्धिन्यासाङ्गभूतो मन्त्रः, तम् उच्चार्य (अं आं
सौः) इति त्रिपुरेति त्रैलोक्यमोहनचक्रनायिका। त्रिपुरा चासौ चक्रेश्वरीमवमृश्य
सम्पूज्य। अत्रापि पूजारूपत्वात् श्रीपादुकेति मन्त्रशेषोऽस्ति परन्तु समष्ट्यर्चने
नास्ति।
द्रामिति सर्वसंक्षोभिणी-मुद्राबीजं तां पठित्वा मुद्राः प्रदर्शयेत्।
चक्रयोगिनीचक्रेशीनां नामानि भिन्नानि शिष्टं समानम् ॥३॥
सूत्र में करशुद्धि मात्र का उल्लेख है। इससे प्रसङ्गवश करशुद्धि का वह
मन्त्र जिससे करशुद्धि और न्यास किया जाता है, उसे उच्चारण करना चाहिये।
वह मन्त्र 'अं आं सौः' है। यह बीजात्मक मन्त्र है।
त्रैलोक्यमोहनचक्र की नायिका का नाम ही त्रिपुरा है। वही चक्रेश्वरी भी
है। इन दोनों शब्दों में कर्मधारय समास है। अवमृश्य अवमृश की पूर्वकालिक