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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

श्रीक्रमः ८५
इति शिरसि न्यसेत्। कवर्गः सबिन्दुः 'कलहीं' इत्यत्र केवलं व्यञ्जनमात्र-
ग्रहणम्। तथा च 'कं खं गं घं ङं क्ल्हीं कामेश्वरी-वाग्देवतायै नमः' इति
ललाटे न्यसेत्। चुं चवर्गं नम इत्यन्तं मन्त्रं पठित्वा भ्रूमध्ये न्यसेत्। टुं टवर्गं
पूर्ववत्। हसलवर्णे तु व्यञ्जनमात्रग्रहणम्। शेषं स्पष्टम्॥२०॥
यहाँ वशिनी आदि योगिनियों के न्यास का वर्णन किया गया है। ये सभी
वाग्देवता मानी जाती हैं। इनकी संख्या और नाम इस प्रकार हैं—
१. वशिनी, २. कामेश्वरी, ३. मोदिनी, ४. विमला, ५. अरुणा,
६. जयिनी, ७. सर्वेश्वरी, ८. कौलिनी। इनके न्यास के समय सर्वप्रथम अकारादि
सबिन्दु आठों वर्ग, निर्धारित बीजमन्त्र, इनके नाम और नमः लगाकर आठ अङ्गों
का स्पर्श करते हैं। इसका क्रम इस प्रकार समझना चाहिये—
क्र. वर्ग निर्धारित विशेष विशेषण नमः स्थान
सं. बीज नाम
१. अवर्ग (सबिन्दु) ब्लूं वशिनी वाग्देवतायै नमः शिरसि
२. सबिन्दु कवर्ग क्ल्हीं कामेश्वरी वाग्देवतायै नमः ललाटे
३. सबिन्दु चवर्ग न्क्लीं मोदिनी वाग्देवतायै नमः भ्रूमध्ये
४. टुं टवर्ग य्लूं विमला वाग्देवतायै नमः कण्ठे
५. तुं तवर्ग ज्म्रीं अरुणा वाग्देवतायै नमः हृदि
६. पुं पवर्ग हस्ल्व्यूं जयिनी वाग्देवतायै नमः नाभौ
७. यादिचतुष्क झ्म्र्यूं सर्वेश्वरी वाग्देवतायै नमः लिङ्गे
(यं रं लं वं)
८. शादिशट्क क्ष्मीं कौलिनी वाग्देवतायै नमः मूलाधारे
(शं षं सं हं कं क्षं)
इस तरह ये आठ मन्त्र बनते हैं। इन मन्त्रों से योगिनी वाग्देवताओं का
शरीर के आठ मुख्य अङ्गों पर न्यास करना चाहिये। श्रीचक्र-साधना में इस
न्यास का बड़ा महत्त्व है। वाग्देवता ही विश्व-सृष्टि भी मूलाधार है। इसीलिये
इसमें १६ स्वरों २५ स्पर्शवर्णों ४ अन्तःस्थों और ४ ऊष्म वर्णों के साथ

८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
२ चक्रेश्वर वर्णों का योग करते हैं। यह पूर्ण वाङ्मय योग है। आठों वाग्देवताओं
के साथ जब ये स्वर और व्यञ्जन शरीर के निर्धारित अवयवों पर न्यस्त होते
हैं, तो उनसे अदृश्य वाग्विद्युत् की रश्मियाँ फूट पड़ती हैं। इस न्यासानुभव
से साधक धन्य हो जाता है॥२०॥
मूलमन्त्रन्यासः
मूलविद्यापञ्चदशवर्णान् मूर्ध्नि मूले हृदि चक्षुस्त्रितये
श्रुतिद्वयमुख-भुजयुगलपृष्ठजानुयुगल-नाभिषु विन्यस्य षोढा चक्रे
न्यस्यान्यस्य वा ।।२१।।
चक्षुस्त्रितयं भ्रूमध्येन सह ज्ञेयम्। श्रुतिद्वयं श्रोत्रद्वयम्। शेषस्थानानि
स्पष्टानि। मूलपञ्चदशवर्णैर्बिन्दुसहितैर्नमोऽन्तैः क्रमेणोक्तपञ्चदशस्थानेषु न्यसेत्।
षोढा षट्प्रकारः। गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशि-पीठभेदेन चक्रन्यासस्तन्त्रा-
न्तरोक्तः। न्यस्यान्यस्य इत्यनेन कृताकृतत्वं सूचितम् ।।२१।।
मूल कादिविद्या के पन्द्रह वर्ण प्रसिद्ध हैं। इसी आधार पर उसे पञ्चदशी
विद्या कहते हैं। इनका न्यास पन्द्रह अङ्गों पर सूत्र के निर्देशानुसार करना चाहिये।
वे पन्द्रह अङ्ग इस प्रकार हैं—
१. मूर्धा (शिर), २. मूल (मूलाधार), ३. हृदय, ४. दक्षनेत्र, ५.
वामनेत्र, ६. भ्रूमध्य, ७, दक्षकर्ण, ८. वामकर्ण, ९. मुख, १०. दाहिना बाहु,
११. वामबाहु, १२. पीठ, १३. दाहिना घुटना, १४. बाँयाँ घुटना, १५. नाभि।
ये १५ अङ्गस्थान माने जाते हैं। इन्हीं पर क्रमशः पञ्चदशी विद्या के बिन्दुसहित
वर्ण न्यस्त करने चाहिये।
यह न्यास छः प्रकार से करने का विधान अन्यान्य तन्त्रों में है। इन
प्रकारों का उद्देश्य उन मुख्य देवों के आनुकूल्य की सिद्धि है। गणपति, ग्रह,
नक्षत्र, योगिनियों, राशियों और पीठों की दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया अन्यान्य तन्त्र
स्वीकार करते हैं। सूत्र में वैकल्पिकत्ता की ओर भी सङ्केत है। करें तो श्रेष्ठ,
नहीं करें तो षोढा न्यास न कर केवल चक्रार्चा की दृष्टि से ही न्यास करना
उचित है ।।२१।।

श्रीक्रमः ८७
देवीरूपत्वसिद्धये न्यासानुक्त्वा ततोऽर्चनाङ्गभूतपात्रस्थापनविधिमुपदिशति
शुद्धाम्भसा वामभागे त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा
पुष्पैैरभ्यर्च्य साधारं शङ्खं प्रतिष्ठाप्य शुद्धजलमापूर्य आदिम-बिन्दुं
दत्त्वा षडङ्गेनाभ्यर्च्य विद्यया अभिमन्त्र्य तज्जलविप्रुड्भिरात्मानं
पूजोपकरणानि च सम्प्रोक्ष्य ।।२२।।
शुद्धाम्भसा इत्यनेन गणपतिपद्धतौ कथितगन्धाक्षतकुसुमसमर्चितत्वं
ज्ञापितम्। शुद्धेन पटपूतेनाम्भसा स्ववामभागे त्रिकोणादिचतुरस्रान्तं
नियमविधिरूपत्वाद् आकाङ्क्षावत्वात् श्यामाक्रमोक्तमत्स्यमुद्रया निर्गमनरीत्या
कृत्वा पुष्पैैरभ्यर्च्य।
आधारशङ्खयोः प्रतिष्ठापने शुद्धजलपूरणे च सन्निहितत्वाविशेषाद्
गणपतिप्रकरणस्थं श्यामाप्रकरणस्थं वा स्वेच्छया कुर्यात्। आदिमबिन्दुसंयोगः
शङ्खजलसंस्कारः। षडङ्गेन षडङ्गमन्त्रैः अग्नीशासुर-वायुकोणेषु षडङ्गदेवता
अभ्यर्च्य। विद्यया पञ्चदश्या। अभिमन्त्र्य अभिमन्त्रणेन संस्कृत्य तज्जलं
संस्कृतजलं तस्य ये विप्रुषो बिन्दवस्तैरात्मानं स्वशरीरं पूजोपकरणानि
गन्धपुष्पप्रथमादीनि च सम्प्रोक्ष्य।।२२।।
शुद्धेन पटरूप शुद्ध जल से ही पूजा का विधान है। यहाँ स्पष्ट उल्लेख
करने का विशिष्ट तात्पर्य गन्धाक्षत-कुसुमांचित वस्त्र से छने हुए जल से है।
वामभाग में अर्थात् श्रीविद्योपासक के अपने ही वामभाग का अर्थ लेना चाहिये।
विधि के अनुसार त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल का श्यामाक्रम
में कहे गये मत्स्यमुद्रा के प्रयोग द्वारा निर्गमन रीति के अनुसार करे और पुष्पों
से उनका पूजन करे।
शङ्ख की प्रतिष्ठा आधार पर करते हैं। ऐसे आधारसहित प्रतिष्ठा करने
के उपरान्त उसे शुद्ध जल से भर देना चाहिये। आदिम बिन्दु के संयोग से
जल का संस्कार हो जाता है। इसके बाद षडङ्गपूजन आवश्यक होता है। यह
पूजन क्रमशः अग्नि, कुबेर, वायु कोणों में षडङ्गमन्त्रों से सम्पन्न किया जाता
है। इन कार्यों के अनन्तर पञ्चदशी विद्या से अभिमन्त्रण कर उसी जल के लघु-

८८ परशुरामकल्पसूत्रम्
लघु विप्रुट्बिन्दुओँ से अपना प्रोक्षण करे। साथ ही साथ पूजा के उपकरणों को
भी प्रोञ्छित करना चाहिये।।२२।।
एवं सामान्यार्घ्यैस्तृप्तिं विधाय विशेषार्घ्यतृप्तिमाह
तज्जलेन त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा मध्यं
विद्यया विद्याखण्डैस्त्रिकोणं बीजावृत्त्या षडस्रं सम्पूज्य वाचमुच्चार्य
अग्निमण्डलाय दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नम इति प्रतिष्ठाप्य
आधारं प्रपूज्य पावकीः कलाः ।।२३।।
तज्जलेन सामान्यार्घ्योदकेन। मध्यं त्रिकोणमध्यम्। विद्यया समष्टि-
विद्यया। सम्पूज्य इति सर्वत्रानुषज्यते। विद्याखण्डैः कूटत्रयेण त्रिकोणं त्रिकोणं
कोणत्रयम् बीजावृत्त्या कूटत्रयद्विरावृत्त्या। षडस्रं सम्पूज्य। वाचं 'ऐं' इति
(सबिन्दुः ऐकारो वाग्भव इति सिध्यति) रविश्वरो बिन्दुयुक्तो वाग्भवं बीज-
मीरितम् इति बीजकोशः। मन्त्रः 'ऐं अग्निमण्डलाय दशकलात्मने
अर्घ्यपात्राधाराय नमः।' इति नमोऽन्तो मन्त्रः। पावकीः वह्निसम्बन्धिनीः।
कलाः चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तैस्तत्तन्नामभिः प्रागादिवृत्तरूपं यजेत् ।।२३।।
सामान्य अर्घ्य के जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल
की विधि से मत्स्यमुद्रा द्वारा निर्गमन कर त्रिकोण मध्य को समष्टिविद्या से अर्चित
करना चाहिये। विद्याखण्ड अर्थात् कूटत्रय से त्रिकोणों की पूजा की जानी चाहिये।
बीजों की आवृत्तिपूर्वक कूटत्रय की दो आवृत्ति से षडस्र की अर्चना भी आवश्यक
मानी जाती है। पुनः वाग्भव बीज 'ऐं' का उच्चारण कर 'अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः' इस मन्त्र को बोलने से पूरा मन्त्र बनता है।
इस मन्त्र से प्रतिष्ठा कर आधार की पूजा करनी चाहिये। पावक की दश कलाओं
के चतुर्थ्यन्त नाम के साथ नमः लगाकर उनकी पृथक् पृथक् पूजा करनी
चाहिये।।२३।।
मदनादुपरि सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने अर्घ्यपात्राय नम इति
संविधाय पात्रं संस्पृश्य कलाः सौरीः, 'सोममण्डलाय
षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नमः' इति पूरयित्वा आदिमं
दत्वोपादिममध्यमौ पूजयित्वा विधोः कलाषोडशकम् ।।२४।।

श्रीक्रमः ८९
मदनस्तु चतुरासनन्यासे (सूत्रे) प्रपञ्चितः। शेषं स्पष्टम्। पात्रं पात्रे सौरीः
कलास्तापिन्यादीः संस्पृश्य पूजयित्वा। आदिमं प्रथमं पूरयित्वा उपादिमं द्वितीयं
मध्यमं तृतीयं तत्रैव स्थापयित्वा विधोः कलाषोडशकम् अमृतादि-
पूर्णमृतान्तम् ।।२४।।
मदन कामवाचक शब्द है। आगमिक कोश की दृष्टि से यह मायाबीज
का वाचक कूट शब्द माना जाता है। मायाबीज के विषय में देवीभागवत की
उक्ति इस प्रकार है— ‘शिवमायाग्निबिन्दुमान्’। शिव हकार को कहते हैं। माया
ईकार है। अग्नि रेफ है और बिन्दु प्रसिद्ध अनुस्वार है। सबको मिलाकर ‘ह्रीं’
यह बीजमन्त्र बनता है। इसी को भुवना, भुवनेशी, लज्जा, हृल्लेखा और
कुलदेवता भी कहते हैं। वृत्तिकार ने कहा है कि, ‘प्रकृतेऽपि स एव मदनो
व्याख्यातः।’
किन्तु यह मान्यता प्रकृत सूत्र के अनुकूल नहीं है। मदन के पर्याय वर्ण
चार हैं—१. इ, २. क, ३. उ और ४. क्लीं। इस तरह मदन का प्रस्तुत प्रसङ्ग
में ‘क्लीं’ बीज में ही तात्पर्य है। यही बाला का मध्य बीज भी है। इसलिये
इस सूत्र में क्लीं के बाद ही अर्थात् इस बीज का ही पहले उच्चारण कर सूर्य
मन्त्र बनता है। इस मन्त्र से १२ सौरी कलाओं की पूजा होनी चाहिये। इसी
तरह चान्द्रकलाओं की पूजा ‘क्लीं सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय
नमः’ इस मन्त्र से करनी चाहिये। इसमें प्रथम आदिम द्वितीय उपादिम अर्थात्
दूसरी और मध्यम अर्थात् तीसरी कलाओं का क्रम अपनाना चाहिये ।।२४।।
तत्र विलिख्य त्र्यस्रमकथादिमयंरेखं हलक्षयुगान्त-स्थित-
हंसभास्वरं वाक्कामशक्तियुक्तकोणं कृत्वा षडस्रं षडङ्गेन
पुरोभागाद्यभ्यर्च्य मूलेन सप्तधा अभिमन्त्र्य दत्तगन्धाक्षतपुष्पधूपदीपः
तद्विप्रुड्भिः प्रोक्षितपूजाद्रव्यः सर्वं विद्यामयं कृत्वा तत्स्पृष्ट्वा
चतुर्नवतिमन्त्रान् जपेत् ।।२५।।
तत्र प्रथमद्रव्ये पूर्वोक्तक्रमेण पूजयित्वा अकारादिविसर्गान्तषोडशस्वरैः
पश्चिमादीशानान्ताम् एकां रेखां कुर्यात्। तत ईशानाद्याग्नेयान्तां कवर्गमारभ्य
तान्तैः षोडशवर्णैः अपरां रेखां सम्पादयेत्। तद् आग्नेयादिपश्चिमान्तं
यादिसान्तैः षोडशभिस्तृतीयारेखां सम्पादयेत्। एवं सति अश्च कश्च थश्च

९० परशुरामकल्पसूत्रम्
आदियेषां वर्णानां दीर्घकारखकारदकारप्रभृतीनां तन्मयास्तदभिन्ना रेखा यस्मिन्
त्रिकोणे तद् अकथादिमयरेखम्। इदं त्र्यस्रविशेषणम्। हश्च लक्षयुगं च तयोः
अन्तः मध्ये स्थितो यो हंस इति वर्णसमुदायस्तेन भास्वरं, द्रव्ये स्वदक्षभागे
‘हम्’ इति विलिख्य, तदुत्तरतो हं स इति वर्णौ विलिख्य तदुत्तरतो लक्षेति
विलिखेत्, एवं चोक्तरूपं भवति। एवं वाक्कामाशक्तयः, तद्युक्तं त्रिकोणं
विलिख्य हंसेन हंस इति मन्त्रेण आराध्य पुष्पादिभिः पूजयित्वा
बहिस्त्रिकोणानि मूलषडङ्गमन्त्रैः पुरोभागादि-स्वाभिमुखाग्रादिप्रादक्षिण्‍येन
अभ्यर्च्य मूलेन सप्तधा सप्तवारमावृत्तेन। तस्मिन् द्रव्ये दत्ता अर्पिता
गन्धाक्षतपुष्पधूपदीपा येन ईदृशः पूजको भवेत्। सर्वविद्या परसंवित् तन्मयं
तदभिन्नं कृत्वा भावयित्वा चतुर्नवतिमन्त्रान् जपेत् ।।२५।।
सर्वप्रथम पूर्वोक्त प्रकार से द्रव्यादि में पूजन कर सूत्रोक्त निर्देश पालन
करना चाहिये। सूत्रानुसार पूजन के उपरान्त वहाँ एक त्रिकोण की संरचना करनी
है। इस कोण का नाम ‘अकथादिमयरेख’ रखा गया है। इसका कारण है त्रिकोण
में तीन रेखायें होती हैं। ज्यामिति के अनुसार इस कोण को अकथ कोण कह
सकते हैं। तीनों रेखाओं के नाम १. अक, २. कथ और ३. थअ या अ-थ
रेखा कहा जा सकता है। अ-क रेखा पर अ से लेकर विसर्ग पर्यन्त १६ स्वर
लिखे जाते हैं। रेखा पश्चिम से ईशानकोण तक बनायी जाती है। दूसरी रेखा
ईशान से अग्निकोण तक जाती है। इसमें ‘क’ कोण से कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग
के १५ अक्षर और ‘त’ अक्षर मिलाकर १६ वर्ण लिखे जाते हैं। तीसरी रेखा
‘थ’ अक्षर से प्रारम्भ होती है। इसे थ-अ रेखा कह सकते हैं। इस पर ‘थ’
से ‘अ’ तक १६ वर्ण लिखे जाते हैं। इसमें तवर्ग के ४, पवर्ग के ५, यवर्ग
के ४ और ऊष्मा के तीन वर्ण मिलाकर १६ वर्णों की एक रेखा होती है।
ईशानकोण क --------------------------------------------- थ अग्निकोण
कवर्ग ५ | चवर्ग ५ | टवर्ग ५ | त १
१६ स्वर थ दधन ४ वर्ण
पवर्ग ५ वर्ण
हं हंसः क्षं अन्तस्थ ४ वर्ण
ऊष्मा श ष स ३ वर्ण
अ पश्चिम

श्रीक्रमः ९१
इस तरह अ क थ नामक कोणों से अकारादि १६ वर्ण, ककारादि १६
वर्ण और थकारादि १६ वर्ण कुल मिलाकर ४८ वर्ण इस त्रिकोण में आ जाते
हैं। यहाँ अकथादिमय त्रिकोण का वर्णन किया गया है।
जहाँ तक ‘ह’ और ‘क्ष’ युगल अक्षरों के प्रश्न हैं, उनके मध्य में
अवस्थित ‘हंस’ रूप वर्ण समुदाय लिखना चाहिये, अर्थात् अपने दाहिने भाग
में ‘हं’ यह वर्ण लिखना चाहिये। वाम भाग में क्ष लिखकर मध्य में हंसः यह
लिखना चाहिये। इन वर्णों से वह त्रिभुज वर्ण-वैद्युतिक आभा से भर उठता है।
उस त्रिभुज के तीनों कोणों पर बाला के तीनों बीज लिखना चाहिये। इसकी
पूजा हंस मन्त्र से की जाती है।
उसके ऊपर पुष्प आदि का श्रद्धा भाव से अर्पण करना चाहिये। इस
पूजा में त्रिकोण की संरचना और अर्चना की बातें कही गयी हैं॥२५॥
चतुर्नवतिमन्त्रानाह
त्रितारी नमः सम्पुटितातेजस्त्रितयकला अष्टात्रिंशत्। सृष्टि-
ऋद्धि-स्मृति-मेधा-कान्ति-लक्ष्मी-द्युति-स्थिति-सिद्धयो ब्रह्मकला
दश। जरा-पालिनी-शान्तिरीश्वरी-रतिकामिके-वरदा-ह्लादिनी-
प्रीतिर्दीर्घा विष्णुकला दश। तीक्ष्णा-रौद्री-भया-निद्रा-तन्द्री-क्षुधा-
क्रोधिनी-क्रियोद्धारी-मृत्यवो रुद्रकला दश। पीताश्वेताऽरुणाऽ-
सिताश्चतस्र ईश्वरकलाः। निवृत्ति-प्रतिष्ठा-विद्या-शान्तीन्धिका-
दीपिका-रोचिका-मोचिका-परा-सूक्ष्माऽसूक्ष्मामृता-ज्ञानाज्ञानामृता-
प्यायिनी-व्यापिनी-व्योमरूपाः षोडश सदाशिवकलाः। हंसश्शु-
चिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोतां वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसद्दृतस-
द्व्योमसदब्जा-गोजा-ऋतजा-अद्रिजा ऋतं बृहत्। प्रतद्विष्णुस्तवते
वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रम-
णेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं
पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-र्मुक्षीय मामृतात्। तद्विष्णोः
परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्। तद्विप्रासो
विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत् परमं पदम्। विष्णुर्र्योनिं
कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु। आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु

९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मे। गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति गर्भं ते अश्विनौ
देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ। इत्येते पञ्चमन्त्राः। मूलविद्या चाहत्य
चतुर्नवति-मन्त्राः।।२६।।
त्रितारी पूर्वोक्ता। त्रितारी नम इत्यनयोर्मध्ये चतुर्नवतिमन्त्रान् पठेत्।
यथा च द्वाभ्यां सम्पुटितो भवति। तेजस्त्रितयं वह्निसूर्यसोमास्तेषां कलाः
(श्यामाक्रमे १८ सूत्रे) अष्टात्रिशंत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—'ऐं ह्रीं श्रीं धूम्रार्चिषे
नमः'। एवम् अग्रेऽपि ज्ञेयम्। वह्निकलाः १०। सूर्यकलाः १२। चन्द्रकलाः
१६। ब्रह्मकलाः १०। विष्णुकलाः १०। रुद्रकलाः १०। ईश्वरकलाः ४।
सदाशिवकलाः १६। इत्थं च कलाः सर्वाः ८८। यद्यपि हंसश्शुचिषद्
इत्यारभ्य पुष्करस्रजावित्यन्तं सप्त ऋचः सन्ति, तथापि 'इत्येते पञ्च मन्त्राः'
इत्युक्त्या चतुर्थपञ्चमौ मिलित्वा एको मन्त्रः। षष्ठसप्तमौ मिलित्वा एको मन्त्रः।
मूलविद्या पञ्चदशी। पूर्वकलाः ८८। उक्तमन्त्राः पञ्च। मूलविद्या चाहत्य सर्वं
मिलित्वा चतुर्नवति-मन्त्राः सम्पद्यन्ते। एतैरभिमन्त्रणेन द्रव्यं संस्कुर्याद् इति
फलितार्थः ।।२६।।
त्रितारी प्रसिद्ध प्रयोग है। यह 'ऐं ह्रीं श्रीं' तीन बीज मन्त्रों के और नमः
के बीच में क्रमशः ९४ मन्त्र सम्पुटित होकर बनते हैं। जैसे वह्नि की पहली
कला का नाम 'धूम्रार्चिः' है। इसके पहले त्रितारी का प्रयोग करें। धूम्रार्चिः में
चतुर्थी विभक्ति लगाकर धूम्रार्चिषे कहें। पुनः नमः जोड़ दें। मन्त्र बनेगा 'ऐं ह्रीं
श्रीं धूम्रार्चिषे नमः'। इसी तरह वह्नि १०, सूर्य १२, सोम १६, ब्रह्मा १०,
विष्णु १०, रुद्र १०, ईश्वर ४ और सदाशिव की १६ = ८८ कलायें होती
हैं। इन सभी कलाओं के पहले त्रितारी बोलकर प्रत्येक में नमः लगाकर ८८
मन्त्र बनते हैं।
इसी तरह 'हंसः शुचिषत्' से लेकर 'पुष्करस्रजौ' तक सात ऋचाओं में
चौथी (तद्विष्णोः परमं पदं.....चक्षुराततम्) और पाँचवीं (तद्विप्रासो.....परमं पदम्)
मिलाकर एक मन्त्र बनाते हैं। यह द्विनवतितम मन्त्र होगा। पुनः छठी और सातवीं
मिलाकर त्रितारी और नमः से संपुटित कर ९३ तम बनता है। पुनः
त्रितारी + मूलविद्या + नमः योग से ९४ मन्त्र बनते हैं। इनका जप करने का
निर्देश सूत्र २५ में ही है।।२६।।

श्रीक्रमः ९३
अथ हैके पञ्चभिरखण्डाद्यैरभिमन्त्रणमामनन्ति ।।२७।।
अथेत्यनेन चतुर्नवतिमन्त्रोत्तरमेवेति क्रमः सूचितः। एके इत्यनेन
पाक्षिकत्वं सूचितम्। अखण्ड आद्यो येषामिति तद्गुणसंविज्ञान-
बहुव्रीहिः।।२७।।
सूत्र में सर्वप्रथम अथ शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह सूचना
हो रही है कि, पहले कहे गये ९४ मन्त्रों के बाद यह क्रम अपनाया जाना
चाहिये। 'ह' आवश्यक अर्थ में अव्यय प्रयुक्त है। एके शब्द यह सूचित करता
है कि, कुछ लोग ही यह नया क्रम अपनाने के पक्षधर हैं। उनके अनुसार
पाँच ऐसे मन्त्रों का उल्लेख किया गया है, जिनसे सुधा देवी का अभिमन्त्रण
करना चाहिये। अखण्डाद्य शब्द में तद्गुण-संविज्ञान बहुव्रीहि समास है।।२७।।
अखण्डाद्याः के ? इत्याकाङ्क्षायामाह
अखण्डैकरसानन्दकरे परसुधात्मनि ।
स्वच्छन्दस्फुरणामत्र निधेह्यकुलनायिके ।।१।।
अकुलस्थाऽमृताकारे शुद्धज्ञानकरे परे ।
अमृतत्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्नरूपिणि ।।२।।
तद्रूपिण्यैकरस्यत्वं कृत्वा ह्येतत्स्वरूपिणि ।
भूत्वा परामृताकारा मयि चित्स्फुरणं कुरु ।।३।।
इति तिस्रो अनुष्टुभो विद्याः ।।२८।।
सहस्रदलं कमलद्वयम्। सर्वकमलानामाधारभूतं ऊर्ध्वमुखमेकं पद्मं
मूलाधारस्याधस्तिष्ठति। तदेकमकुलपदवाच्यम्। एवं ब्रह्मरन्ध्रस्थिताधो
मुखसहस्रच्छदपद्ममपि अकुलम्। प्रकृते ब्रह्मरन्ध्रस्थितस्यैव ग्रहणम्। तस्यैव
अमृतस्रावित्वात्। अकुलस्य नायिका तदधिष्ठात्री तत्सम्बोधने हे
'अकुलनायिके! अखण्डो अविच्छिन्न एकरसो दुःखासम्भिन्नो य आनन्दस्तं
करोति व्यञ्जयति तादृशे। परा उत्कृष्टा या सुधा ब्रह्मरन्ध्रस्था अमरत्वकारिणी
तदात्मनि तत्स्वरूपे। अत्र स्वच्छन्दा स्वतन्त्रा या चित् तस्याः, स्फुरणां

९४ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रकाशशक्तिं निधेहि स्थापय। हे परे! श्रेष्ठे क्लिन्नमार्द्रस्वरूपं तदस्मिन्नस्ति इति
क्लिन्नरूपिणी अमृतत्वं निधेहि। संस्थापय सम्पादय। अकुले विद्यमानं यद्
अमृतं तस्य स्वरूपमिव स्वरूपं यस्याः सा परा (तत्सम्बोधने) तद्रूपिणि मयि
देहाभिमानिनि। परं यद् अमृतं आनन्दस्तदाकारा भूत्वा ऐकरस्यं
चित्तस्यैकाकारतां कृत्वा सम्पाद्य चित्स्फुरणं कुरु स्वस्वरूपप्रकाशं कुरु। इति
तिस्रः अनुष्टुप्छन्दस्का विद्या मन्त्राः।।२८।।
तन्त्रशास्त्र में कुल और अकुल से दोनों विशिष्ट उपासना सम्प्रदाय के
पारिभाषिक शब्द माने जाते हैं। कहा गया है कि, 'अनुत्तरं परं धाम', एक दूसरे
स्थान पर कहा गया है कि, 'तदेवाकुलमुच्यते'।
'अकुलस्यास्य देवस्य कुलप्रथनशालिनी।
कौलिकी सा पराशक्तिरवियुक्तो यया प्रभुः।।'
अकुल की कुलप्रथनशालिनी शक्ति को ही कौलिकी शक्ति कहते हैं। ऐसी
अकुल की कुलप्रथनशालिनी शक्ति ही कुल-नायिका कहलाती है। वृत्तिकार ने
दो सहस्र दल कमलों को ही 'अकुल' कहा है। एक ऊर्ध्वमुख अकुल पद्म
मूलाधार के नीचे और अधोमुख एक अकुल सहस्रार पद्म भी है, जिसे सहस्रार
कहते हैं। यहाँ पर ब्रह्मरन्ध्रस्थ अकुल पद्म को अकुल कहा गया है। उसकी
नायिका सहस्राराधिष्ठात्री परमाम्बा ललिता त्रिपुरसुन्दरी मानी जाती है। वह
अखण्ड एकरस आनन्द प्रदान करने वाली परमाम्बा परात्मक ब्रह्मरन्ध्रस्थ सुधा
से समग्र विश्व को अभिषिक्त करती है। उपासक यह प्रार्थना करता है कि, मातः,
तुम अत्र अर्थात् यहाँ इस कर्म यज्ञ में स्वच्छन्द अर्थात् स्वातन्त्र्यमयी
चित्स्फुरणता को स्थापित करो।
हे क्लिन्न (आर्द्र) अर्थात् दया-द्रवित माँ, तुम वात्सल्यमयी हो, मुझ वत्स
पर कृपा करो। मुझ अबोध उपासक में देहाभिमान भरा हुआ है। तुम्हारी उपासना
का आनन्द निर्झर भी मेरे हृदय में फूटता है। हे परब्रह्मस्वरूपिणि, तुम
आनन्दरूपिणी भी हो। इसी आनन्दीभाव से भव्य माँ तुमसे मेरी यही प्रार्थना
है कि, मेरे चित्त का ऐकरस्यत्व तुमसे सम्पादित कर दिया जाय। अर्थात् हे
आनन्दमयी माँ, मेरे चित्त में चिरन्तनरूपा तुम्हारे आनन्द का उल्लास मङ्गलमयी

चारुता भर दे। ध्यान में तुम्हारी एकरूपता सिद्ध हो जाय। मेरी चिति शक्ति
में ऊर्जा भर दे। वह तुम्हारे अस्तित्व के परिवेश में मेरी संवित्ति की स्फुरत्ता
जागृत कर दे। यह अनुष्टुप् छन्दों में व्यक्त आनुष्टुभी विद्या है।।२८।।
चतर्थम् अमृतेशीमन्त्रमाह
अथो वाचो 'ब्लूं झौं'मिति 'जूं सः' इति चोक्त्वा अमृते
अमृतोद्भवे अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहेति
चतुर्थो मन्त्रः ।।२९।।
वाचम् ऐं, अतिद्वयं चोक्त्वेति च त्यक्त्वा शेषं मन्त्रस्वरूपम्। हे अमृते
अस्मिन् द्रव्ये अमृतं स्रावय इति। शेषाण्यमृते इत्यस्य विशेषणानि।।२९।।
आनुष्टुभी, तीन महाविद्याओं के बाद यहाँ अमृतेशी विद्या का कथन कर
रहे हैं। इस मन्त्र में अर्थात् ऐं बीज, पुनः 'ब्लूं' बीज पुनः 'झौं' बीज, का
प्रयोग करना चाहिये। तीनों बीज मन्त्रों के प्रयोग के बाद 'अमृते अमृतोद्भवे
अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहा' इस मन्त्रांश का प्रयोग
करते हैं। इस मन्त्र का आनन्दवादी रूप महत्त्वपूर्ण माना जाता है।।२९।।
पञ्चमं मन्त्रमुद्धरति
वाग्भवो वद वद ततो वाग्वादिनि वाङ्‌मदनक्लिन्ने क्लेदिनि
क्लेदय महाक्षोभं कुरुयुगलं मादनं शक्तिर्मोक्षं कुरु कुरु शब्दैः
सहचतुर्दशपञ्चदशपिण्डः सहचतुर्दशषोडशपिण्डश्चेति पञ्चमीयं
विद्यैताभिः अभिमन्त्र्य ज्योतिर्मयं तदर्घ्यं विधाय ।।३०।।
वाग्भवः ऐं। वाक् ऐं। मदनः क्लीं। कुरुयुगलं द्विवारं कुर्वित्युच्चार्य।
मादनं क्लीं। शक्तिः सौः। अचां चतुर्दशः औ। पञ्चदशः अनुस्वारः। पिण्डः
समुदायः। षोडशो विसर्गः। तथा च मन्त्रस्वरूपम् 'ऐं वद वद वाग्वादिनि
ऐं क्लीं क्लिन्ने क्लेदिनि क्लेदय महाक्षोभं कुरु कुरु क्लीं सौः मोक्षं कुरु
कुरु हसौँ स्हौः।' इतीयं पञ्चमी विद्या। एताभिः पञ्चभिः अभिमन्त्र्य ज्योतिर्मयं
निर्दोषं तदर्घ्यं विधाय।। ।।

९६ परशुरामकल्पसूत्रम्
वाग्भव और वाक् ये दोनों कूट शब्द हैं। इनसे ‘ऐं’ बीज का बोध होता
है। इसी तरह मदन और मादन इन दोनों शब्दों से ‘क्लीं’ बीज का बोध होता
है। शक्ति शब्द से यहाँ ‘सौः’ परा बीज का बोध होता है। स्वर सोलह होते
हैं। इनका चौदहवाँ अक्षर ‘औ’ चतुर्दश धाम माना जाता है। पन्द्रहवाँ अनुस्वार
और सोलहवाँ विसर्ग है। इन सबको मिलाकर जो मन्त्र बनता है, वह संस्कृत
व्याख्या में हैं। इसे ध्यान से स्पष्ट उच्चारणपूर्वक अर्घ्य जल का प्रोक्षण होता
है। इस मन्त्र को पञ्चमी ज्योतिर्मयी विद्या भी कहते हैं।।३०।।
तत्पात्रस्थबिन्दुभिः करणीयकृत्यमाह
तद्बिन्दुभिस्त्रिशः शिरसि गुरुपादुकामिष्ट्वा आर्द्रं ज्वलति
ज्योतिरहमस्मि ज्योतिर्ज्वलति ब्रह्माहमस्मि योऽहमस्मि ब्रह्माहमस्मि
अहमस्मि ब्रह्माहमस्मि अहमेवाहं मां जुहोमि स्वाहेति तद्बिन्दुमात्मनः
कुण्डलिन्यां जुहुयात् ।।३१।।
तद्बिन्दुभिर्विशेषार्घ्य बिन्दुभिस्त्रिशः त्रिवारं शिरसि द्वादशान्तस्थाने
गुरुपादुकामिष्ट्वा गुरुपादुकोद्देशेन द्रव्यदानं कृत्वा ‘आर्द्रं ज्वलति’ इति
स्वाहान्तमन्त्रेण तद्बिन्दुं गुरुपादुकायागशेषबिन्दुमित्यर्थः। आत्मनः स्वस्य
कुण्डलिन्यां चिद्वह्नौ, जुहुयाद् इत्यनेन अस्मिन् कर्मणि होमबुद्धिं दृढा
कार्या ।।३१।।
विशेष अर्घ्य जल के बिन्दुओं से तीन बार शिरोभाग के द्वादशान्त स्थान
में गुरुपादुका के उद्देश्य से अन्तर्याग कर ‘आर्द्रं ज्वलति’ से लेकर ‘स्वाहा’
पर्यन्त निर्दिष्ट मन्त्र से अर्घ्य के जल से ही अपनी कुण्डलिनी शक्ति की चिदग्नि
में हवन करें।
यह सूत्र श्रीविद्या-साधना की सर्वातिशायिनी दशा का शब्दचित्र
प्रस्तुत करता है। साधक की अहंता में इदन्ता का अवसान हो गया है। वह
ब्रह्ममयी मधुमती भूमिका में प्रवेश पा गया है। उसकी कुण्डलिनी की चिदग्नि
से उसका चिदाकाश प्रकाशमान हो रहा है। साधक की चेतना में ‘श्री’
का अवतरण अध्येता की अन्तर्दृष्टि में साक्षात् होता हुआ प्रतीत
हो रहा है।।३१।।

श्रीक्रमः ९७
एतदर्घ्यशोधनमिति शिवम् ।।३२।।
एतत् कुण्डलिन्यां जुहुयाद् इत्यन्तं कर्म अर्घ्यशोधनम् अर्घ्यसंस्कारः।
शिवमित्यनेन अर्घ्यप्रकरणसमाप्तिः सूचिता।।३२।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
परशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) श्रीक्रमो नाम तृतीयः खण्डः सम्पूर्णः ।।
अर्घ्य विधि एक असामान्य महत्त्व की विधि है। कुण्डलिनी होमरूप
आध्यात्मिक याग से पूर्णतया अर्घ्यसंस्कार सम्पन्न होतां है और प्रकरण भी पूर्ण
होता है।।३२।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का श्रीक्रम नामक तृतीय खण्ड परिपूर्ण ।।३।।
।। शुभं भूयात् ।।

ललिताक्रमः
[ चतुर्थः खण्डः ]
हृदि स्थिताया देवतायाः श्रीचक्रे आवाहनप्रकारं दर्शयितुमुपक्रमते
अथ हृच्चक्रस्थितामन्तस्सुषुम्णा-पद्माटवीनिर्भेदन-कुशलां
निरस्तमोहतिमिरां शिवदीपदीप्तिमाद्यां संविदं वह्रन्नासापुटेन निर्गमय्य
लीलाकलितवपुषं तां त्रिखण्डमुद्राशिखण्डे कुसुमाञ्जलौ हस्ते
समानीय ।।१।।
अथेति क्रमविशेषद्योतकम्। हृच्चक्रम् अनाहतं तत्र स्थिताम्। अन्तः
सुषुम्णायां यानि पद्मानि तेषामटवी दुर्गमं वर्त्म तस्य निर्भेदनं गमनानुकूलवर्त्म-
सम्पादनं तद्विषये कुशलाम्, निरस्तो दूरीकृतो मोहोऽज्ञानं तदेव तिमिरं यया
ताम्। शिवात्मको यो दीपस्तस्य दीप्तिं प्रकाशरूपाम्। यथा दीपप्रभयो-
रविनाभावसम्बन्धः, एवं शिवशक्त्योरप्यविनाभावः सूचितः। आद्याम् अपरि-
च्छिन्नां संविदं नासापुटेन वहन्। लीलया स्वेच्छामात्रेण आकलितं स्वीकृतं
वपुषं त्रिखण्डा जन्ममृत्युजरा, यद्वा सत्त्वरजस्तमोगुणान् खण्डयतीति
केवलमोक्षप्रदेत्यर्थः। यद्वा त्रीणि खण्डानि इच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मिका। मोदनाद्
द्रावणाद्वा मुद्रा तया शिखण्डिते। अञ्जलौ हस्ते समानीय।।१।।
श्रीचक्र में जिस देवता की पूजा की जाती है, वह हृदय में शाश्वत रूप
से प्रतिष्ठित परा देवता ही है। उसी का आवाहन श्रीचक्र में करते हैं। तत्पश्चात्
उसकी पूजा की जाती है। इसी आवाहन प्रकार के वर्णन का उपक्रम यहाँ कर
रहे हैं।
अथ शब्द ललिताक्रम के द्योतन के प्रारम्भ अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है। हृच्चक्र
अनाहत को कहते हैं। (वस्तुतः हृत् शरीर का परा केन्द्र है। मेरुदण्ड के मध्य

में यह रहता है। अनाहत उसकी छाया है)। मेरुदण्ड में अवस्थित हृत् केन्द्र
में सुषुम्ना के आन्तर पद्म का दुर्गम पथ योगियों की साधना से ही प्रकाशित
होता है। साधना के अभाव में ही उसे 'अटवी' कहा जा सकता है। उस अटवी
का भेदन माँ के अनुग्रह पर ही निर्भर करता है। इस भेदन प्रक्रिया में वही
कुशल है। हृदय केन्द्र से सहस्रार तक की यात्रा में गमन के अनुकूल पथ
सम्बन्धी सारी साधन सुविधाओं को देने में एकमात्र अधिकारिणी परमाम्बा का
अनुग्रह निरन्तर अपेक्षित होता है।
मोह, अज्ञान के अन्धकार से उत्पन्न होने वाला माया का मोहक पुत्र माना
जाता है। यह अज्ञता को और भी घना बना देता है। ऐसे अन्धतमस् का विनाश
माँ ही कर सकती है और साधक की विनम्र पुकार के सुनते ही उसे तुरत निरस्त
कर देती है। उसका परिचय भौतिक स्तर के उपासक दीप की दीप्तिरूप आभा
को देखकर पा सकते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, दीप और दीप्ति का
अविनाभाव सम्बन्ध है। जहाँ दीप की लौ जलेगी, आभा अपनी चमक चारों ओर
फैलाकर ही रहेगी, उसी तरह भगवान् का अस्तित्व शाश्वत रूप से विश्व में व्याप्त
है। यह व्यापक शिव का स्वरूप है। शिव की व्याप्ति ही शैवमहाभाव की दीप्ति
है। अतः शिव और माँ भगवती शक्ति का भी अविनाभाव सम्बन्ध है। यह बात
साधक उपासक को अपने मन में बिठला लेनी चाहिये। उस शक्ति को आद्या
संविद् अपरिच्छिन्न चिति कहते हैं।
उस आद्या शक्ति को ही प्राणापानवाह के माध्यम से साधक अनुशासित
रूप से वहन करता है। श्वास प्रक्रिया का महत्त्व जीवधारियों के लिये तो है
ही; किन्तु योगी श्वास साधना में संलग्न रहकर प्रतिपल परमाम्बा का वात्सल्य
पीयूष पीता रहता है। इस श्वास के निर्गमन में जीवन का रहस्य निहित रहता
है। यह सोचने की बात है कि, अपान चन्द्र पर चढ़कर प्राण का सूरज भी
शरीर से निर्गमन व्यापार के माध्यम से बाहर आ जाता है। उस समय शरीर
में श्वास नहीं रहता है। वह शरीर से बाहर मध्य द्वादशान्त में समा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में जब सूर्य-चन्द्र दोनों अस्त होते हैं। तो अमावास्या होती है।
तन्त्र, जब प्राणापानरूप रवि-सोम अस्त होकर मध्य द्वादशान्त में समा जाते
हैं, तो उस बिन्दु को अमा-केन्द्र कहता है। अमा-केन्द्र ही जीवन का उत्स
है। वहाँ महाशैव-सद्भाव की व्याप्ति भी मानते हैं। योगी साधक लीलापूर्वक

१०० परशुरामकल्पसूत्रम्
अर्थात् अपनी स्वतन्त्रता शक्ति के बल पर इसे आकलित अर्थात् स्वीकार करते
हैं। शरीर में योगी ऐसे शिव का प्रति श्वास में साक्षात्कार करता है। प्रति श्वास
के प्रथम उन्मेष को प्रतिपदा कहते हैं। यह शैव दीप की दीप्ति मानी जाती
है। प्रतिपदा से पूर्णिमा तक कृष्णपक्ष तन्त्र की दृष्टि से मानते हैं और यही
शाक्त व्याप्ति है। श्वास के उद्गम-निर्गम रूप एक प्राणापानवाह में व्याप्त इस
रूप का साक्षात्कार करने में समर्थ व्यक्ति ही श्रीचक्र की साधना कर सकता
है। इसलिये श्रीविद्या-साधना का अधिकार प्राप्त करना इसकी पहली शर्त है।
ऐसे शिवदीपदीप्ति-रूप शिव-शक्ति के इस अविनाभावी रूप को साधक
अपने हाथ की फूलों से भरी अंजुलि में आवाहित करने में सफल हो जाता
है। यह अंजुलि भी त्रिखण्ड मुद्रा शिखण्डित होती है। त्रिखण्ड पारिभाषिक शब्द
है। मुद्रा शब्द भी मोदन और द्रावण के अन्वर्थ से विभूषित है। इच्छा, ज्ञान
और क्रिया रूप तीन खण्डों में क्रिया शक्ति विश्वामर्श में मोदन और द्रावण
व्यापार को शिखण्डित अर्थात् ग्रथित करती है।
जन्म, मृत्यु और जरा, अथवा सत्त्व, रज और तम आदि तीन अन्य
खण्ड भी माने जा सकते हैं। इनको खण्डित करने वाली अर्थात् केवल मोक्षप्रदा
मुद्रा ही त्रिखण्ड मुद्रा मानी जा सकती है। योगिनीतन्त्र के अनुसार चिदात्म भित्ति
में विश्व का प्रकाश और विमर्श स्वेच्छा से करने वाली पूर्ण विविकीर्षा से
समन्वित क्रियाशक्ति ही मोदन और द्रावण करने के कारण मुद्रा मानी जाती
है। यही त्रिखण्डा भी मानी जाती है। यह क्रियाशक्ति का अदृष्ट रूप है। बाह्य
रूप में वह कुसुमाञ्जलिपूर्ण हाथ में ही आवाहित की जाती है॥१॥
मायालक्ष्मीपरा उच्चार्य देवी नाम चामृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नम इति कल्पयित्वा ।।२।।
"माया ह्रीं, लक्ष्मी श्रीं, परा सौः। एवं बीजत्रयम् उच्चार्य देवी नाम
शक्तिचक्रैकनायिकाया ललितायाः (च उच्चार्य) अमृतचैतन्यमूर्तिं कल्पयामि
नमः" इति त्रयस्त्रिंशद्वर्णो मन्त्रः। तन्मन्त्रमुच्चार्य देवीं कल्पयित्वा।।२।।
इस सूत्र में पूर्व स्वीकृत त्रितारी का ग्रहण नहीं किया गया है।
परम्परानुसार उसे लगाकर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—"ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं
सौः शक्तिचक्रैकनायिकाया ललिताया अमृतचैतन्यमूर्त्तिं कल्पयामि नमः" यह ३३

ललिताक्रमः १०१
वर्णों का महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना जाता है। इस सूत्र के अनुसार यह सिद्ध होता
है कि, सर्वप्रथम इस मन्त्र से मूर्ति-प्रकल्पन करने के बाद उपासक उस कल्पित
मूर्ति को नासापुट से बाहर करता है और उसे फूलों से भरी अंजलि वाले हाथों
में समानयन करता है। यही क्रम परम्पराप्राप्त क्रम है॥२॥
हसरयुजं वाचं हसयुक्तां कलरीं हसरचतुर्दशषोडशानप्युच्चार्य,
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे।
सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
इति बैन्दवचक्रे परचितिमावाह्य॥३॥
हश्च सश्च रश्च तैर्युतं वाचं 'हस्त्रैं'। हश्च सश्च आभ्यां युक्तो ककारलकार-
रेफेकार-बिन्दुसमुदायः 'हस्क्लरीं'। तथा हश्च सश्च रश्च, चतुर्दश औकारः
षोडशो विसर्गः 'हस्त्रौः' इति एतानुच्चार्य परमेश्वरीत्यन्तं यथासूत्रं पठित्वा
बिन्दुचक्रे परचितिमावाहयेत्॥३॥
सूत्र के अनुसार पूरा मन्त्र 'ऐं ह्रीं श्रीं हस्त्रैं हस्क्लरीं हस्त्रौः' बनता है।
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे। सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि।।
उक्त मन्त्र के साथ यह श्लोक भी बोलते हैं। तब पूरा मन्त्र बनता है।
श्लोकार्थ के सम्बन्ध में सेतुबन्ध का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है। वह महापद्मवन
को सहस्रार मानता है। कारणानन्द अपरिच्छिन्न आनन्द है। यह अनुत्तर परमशिव
का स्वातन्त्र्य है। माँ ललिताम्बा का विग्रह उसी में उल्लसित है। ऐसी वात्सल्य-
मयी परमेश्वरी माँ का बीजमन्त्रों के रथ पर आवाहन उपासक की अनुभूति का
विषय है॥३॥
चतुष्षष्ट्युपचारविधिः
चतुष्षष्ट्युपचारान् कुर्यात्। सर्वे उपचारमन्त्राः। त्रितारी पूर्वाः
कल्पयामि नम इत्यन्ताः कर्त्तव्याः ।।४।।
चतुष्षष्ट्युपचारमध्ये एकस्याप्ययो मा भवत्वित्यत्रैव तात्पर्यम्।
उपचारपदार्थश्च कल्प्यमानद्रव्येण सुखविशेषः, तं कुर्याद् उत्पादयेद् इत्यर्थः।
शेषं स्पष्टम्।।४।।

१०२ परशुरामकल्पसूत्रम्
पाँचवाँ सूत्र चौंसठ उपचारों का निर्देश करता है। यह सूत्र उसी सूत्र का
पूरक है। यह आज्ञा देता है कि, इन सभी उपचारों का प्रयोग आवश्यक है।
इनके सभी मन्त्रों से पूर्व त्रितारी (ऐं ह्रीं श्रीं) का प्रयोग अनिवार्यतः आवश्यक
है तथा ‘कल्पयामि नमः’ तक मन्त्र पूरे होते हैं। यह ध्यान देने की बात है
कि, मन्त्र के माध्यम से वस्तु-समर्पण द्वारा आराध्य को जो सुख मिलता है,
उसे उपचार कहते हैं।।४।।
त्रितारीमुच्चार्य पाद्यं कल्पयामि नम इति क्रमेण आभरणा-
वरोपणं सुगन्धितैलाभ्यङ्गं मज्जनशालाप्रवेशनं मज्जनमण्डपमणि-
पीठोपवेशनं दिव्यस्नानीयोद्वर्त्तनम् उष्णोदकस्नानं कनककलश-
च्युतसकलतीर्थाभिषेकं धौतवस्त्रपरिमार्जनम् अरुणदुकूलपरिधानम्
अरुणकुचोत्तरीयमालेपमण्डपप्रवेशनमालेप-मण्डपमणिपीठोपवेशनं
चन्दनागुरु-कुङ्कुमसङ्गुमगमदकर्पूरकस्तूरी-गोरोचनादिदिव्यगन्ध-
सर्वाङ्गीणविलेपनं केशभरस्य कालागुरुधूपं मल्लिकामालतीजाती-
चम्पकाशोकशतपत्रपूगकुङ्मलीपुन्नाग-कह्लार-मुख्यसर्वर्तुकुसुममालां
भूषणमण्डपप्रवेशनं भूषणमण्डपमणिपीठोपवेशनं नवमणिमुकुटं
चन्द्रशकलं सीमन्तसिन्दूरं तिलकरत्नं कालाञ्जनं पालीयुगलं
मणिकुण्डलयुगलं नासाभरणम् अधरयावकं प्रथमभूषणं कनक-
चिन्ताकं पदकं महा-पदकं मुक्तावलिम् एकावलिं छन्नवीरं
केयूरयुगलचतुष्टयं वलयावलिम् ऊर्मिकावलिं काञ्चीदाम-कटिसूत्रं
सौभाग्याभरणं पादकटकं रत्ननूपुरं पादाङ्गुलीयकम् एककरे पाशम्
अन्यकरे अङ्कुशम् इतरकरे पुण्ड्रेक्षुचापम् अपरकरे पुष्पबाणान्
श्रीमन्माणिक्यपादुके स्वसमानवेषाभिरावरणदेवताभिः सह
महाचक्राधिरोहणं कामेश्वराङ्कपर्यङ्कोपवेशनम् अमृतासवचषकम्
आचमनीयं कर्पूरवीटिकाम् आनन्दोल्लासविलासहासं मङ्गलारार्तिकं
छत्रं चामरयुगलं दर्पणं तालवृन्तं गन्धं पुष्पं धूपं दीपं नैवेद्यं
कल्पयामि नम इति चतुष्षष्ट्युपचारान् विधाय ।।५।।
अत्र सामान्यपरिभाषयैव त्रितारीसिद्धौ पुनर्विधानं तदवयवत्वं ज्ञापयति।
शेषं स्पष्टम्। क्रमेण इत्यनेन पाद्यमिति स्थाने आभरणावरोपणादि-पदोच्चारणं

ललिताक्रमः १०३
ज्ञापयति। स्नानीयोद्वर्त्तनं शरीरलग्नस्नेहवियोगसाधनं सुगन्धिचूर्णविशेषः।
कुचोत्तरीयं कञ्चुकम्। आलेपः सुगन्धिद्रव्यशरीरसंयोगः। कुङ्कुमं काश्मीरम्।
सङ्कः वृक्षविशेषः। मृगमदः कस्तूर्यवान्तरभेदः। मल्लिकामालतीत्यादिना
षडृतुसमुद्भवकुसुमानि। पाली कर्णभूषणम्। प्रथमभूषणं मङ्गलसूत्रम्। पदकं
कण्ठभूषणम्। मुक्तावलिः एकावलिर्माला। छन्नवीरं भूषणम्। वलयावलिः
कङ्कणभूषणम्। ऊर्मिका अङ्गुलिभूषणम्। आयुधान्याह—पुण्ड्रेक्षुतः
पुष्पबाणपर्यन्तानि। अमृतासवो मद्यम्। कर्पूरवीटिकादयः॥५॥
सामान्यतया श्रीविद्या-साधना के परम्पराप्राप्त मन्त्रों में त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करते हैं। इस सूत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख कर दिया गया है। इससे
यह सूचित हो रहा है कि, इस प्रक्रिया का अवयवरूप ही त्रितारी बीज मन्त्र
है। इनका उच्चारण कर 'पाद्यं कल्पयामि' यह कहना चाहिये। बार-बार
'ललिताम्बायै नमः' यह उच्चारण आवश्यक नहीं किन्तु सुविधानुसार सभी
उपचारों के साथ कहने में कोई दोष भी नहीं। जैसे 'ऐं ह्रीं श्रीं पाद्यं कल्पयामि
ललिताम्बायै नमः' यह मन्त्र पाद्य के साथ बोलते हैं, उसी तरह 'आभरणं
कल्पयामि' के साथ भी उच्चारण करते हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः चौंसठ उपचारों
के साथ भी अपनायी जानी चाहिये। शेष क्रम स्पष्ट है।
सूत्र में प्रयुक्त मुख्य शब्दों के अर्थ जानना भी आवश्यक है। जैसे—
१. स्नानीयोद्वर्त्तन—सुगन्धित उबटन। इसे लगाकर नहाने से शरीर में पसीने
आदि की तैलिकता नष्ट हो जाती है।
२. कुचोत्तरीय—कञ्चुकरूप स्तनाच्छादक परिधान।
३. आलेपमण्डप—वह स्थान या कक्ष जहाँ माँ परमाम्बा के शरीर पर सुगन्धि
लेप कर मालिश की जाती है।
४. कुङ्कुम—कश्मीर में उत्पन्न रञ्जक द्रव्य।
५. सङ्क—विशेष वृक्ष जिसका चूर्ण उपलेप में काम आता है।
६. मृगमद—कस्तूरी का एक भेद।
७. सर्वाङ्गीण—सभी अङ्गों में लगाने योग्य।
८. कालागुरु—इसका धूप केशराशि को काला करता है।

१०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
९. मल्लिकामालती—आदि छः ऋतुओं में होने वाले पुष्पों के ये प्रतीक
संज्ञा शब्द हैं।
१०. सीमन्त—'माँड'संज्ञक शिर पर दोनों ओर केश करने से उभरी सीधी रेखा
जो मध्य में होती है।
११. तिलकरत्न—तिलक के स्थान पर रत्न।
१२. पाली—कपोलपाली को सजाने वाली कान की बाली।
१३. अधरयावक—होठों के रँगने का रंग, महावर।
१४. प्रथमभूषण—मङ्गल-सूत्र।
१५. पदक—कण्ठभूषण।
१६. महापदक—कण्ठा।
१७. मुक्तावलि—मुक्ता-माला।
१८. एकावलि—२७ मणियों की बाली या माला।
१९. छत्रवीर—दो भागों में बाँटने वाली छाती की माला।
२०. केयूर—बाहु के कड़े।
२१. वलयावलि—माला।
२२. ऊर्मिकावलि—घुँघुरुओं वाली माला।
२३. काञ्ची—करधनी।
२४. सौभाग्याभरण—जघनों पर लटकने वाले झुमके।
२५. पादकटक आदि—पैर के आभूषण आयुध—
१. पुण्ड्रेक्षु—गन्ना।
२. पुष्पबाण—पुष्प के बने पाँच फूलों में काम बाण।
३. पाश—बाँधने का रज्जु।
४. अंकुश—अंकुश (बरछी)।
आधार वस्तु—
१. पादुका—दो खड़ाऊँ
२. महाचक्र—जहाँ देवियों के साथ माँ आरोहण करती हैं।