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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 320 में से

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पृष्ठ 128

८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
२ चक्रेश्वर वर्णों का योग करते हैं। यह पूर्ण वाङ्मय योग है। आठों वाग्देवताओं
के साथ जब ये स्वर और व्यञ्जन शरीर के निर्धारित अवयवों पर न्यस्त होते
हैं, तो उनसे अदृश्य वाग्विद्युत् की रश्मियाँ फूट पड़ती हैं। इस न्यासानुभव
से साधक धन्य हो जाता है॥२०॥
मूलमन्त्रन्यासः
मूलविद्यापञ्चदशवर्णान् मूर्ध्नि मूले हृदि चक्षुस्त्रितये
श्रुतिद्वयमुख-भुजयुगलपृष्ठजानुयुगल-नाभिषु विन्यस्य षोढा चक्रे
न्यस्यान्यस्य वा ।।२१।।
चक्षुस्त्रितयं भ्रूमध्येन सह ज्ञेयम्। श्रुतिद्वयं श्रोत्रद्वयम्। शेषस्थानानि
स्पष्टानि। मूलपञ्चदशवर्णैर्बिन्दुसहितैर्नमोऽन्तैः क्रमेणोक्तपञ्चदशस्थानेषु न्यसेत्।
षोढा षट्प्रकारः। गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशि-पीठभेदेन चक्रन्यासस्तन्त्रा-
न्तरोक्तः। न्यस्यान्यस्य इत्यनेन कृताकृतत्वं सूचितम् ।।२१।।
मूल कादिविद्या के पन्द्रह वर्ण प्रसिद्ध हैं। इसी आधार पर उसे पञ्चदशी
विद्या कहते हैं। इनका न्यास पन्द्रह अङ्गों पर सूत्र के निर्देशानुसार करना चाहिये।
वे पन्द्रह अङ्ग इस प्रकार हैं—
१. मूर्धा (शिर), २. मूल (मूलाधार), ३. हृदय, ४. दक्षनेत्र, ५.
वामनेत्र, ६. भ्रूमध्य, ७, दक्षकर्ण, ८. वामकर्ण, ९. मुख, १०. दाहिना बाहु,
११. वामबाहु, १२. पीठ, १३. दाहिना घुटना, १४. बाँयाँ घुटना, १५. नाभि।
ये १५ अङ्गस्थान माने जाते हैं। इन्हीं पर क्रमशः पञ्चदशी विद्या के बिन्दुसहित
वर्ण न्यस्त करने चाहिये।
यह न्यास छः प्रकार से करने का विधान अन्यान्य तन्त्रों में है। इन
प्रकारों का उद्देश्य उन मुख्य देवों के आनुकूल्य की सिद्धि है। गणपति, ग्रह,
नक्षत्र, योगिनियों, राशियों और पीठों की दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया अन्यान्य तन्त्र
स्वीकार करते हैं। सूत्र में वैकल्पिकत्ता की ओर भी सङ्केत है। करें तो श्रेष्ठ,
नहीं करें तो षोढा न्यास न कर केवल चक्रार्चा की दृष्टि से ही न्यास करना
उचित है ।।२१।।