परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रकाशशक्तिं निधेहि स्थापय। हे परे! श्रेष्ठे क्लिन्नमार्द्रस्वरूपं तदस्मिन्नस्ति इति
क्लिन्नरूपिणी अमृतत्वं निधेहि। संस्थापय सम्पादय। अकुले विद्यमानं यद्
अमृतं तस्य स्वरूपमिव स्वरूपं यस्याः सा परा (तत्सम्बोधने) तद्रूपिणि मयि
देहाभिमानिनि। परं यद् अमृतं आनन्दस्तदाकारा भूत्वा ऐकरस्यं
चित्तस्यैकाकारतां कृत्वा सम्पाद्य चित्स्फुरणं कुरु स्वस्वरूपप्रकाशं कुरु। इति
तिस्रः अनुष्टुप्छन्दस्का विद्या मन्त्राः।।२८।।
तन्त्रशास्त्र में कुल और अकुल से दोनों विशिष्ट उपासना सम्प्रदाय के
पारिभाषिक शब्द माने जाते हैं। कहा गया है कि, 'अनुत्तरं परं धाम', एक दूसरे
स्थान पर कहा गया है कि, 'तदेवाकुलमुच्यते'।
'अकुलस्यास्य देवस्य कुलप्रथनशालिनी।
कौलिकी सा पराशक्तिरवियुक्तो यया प्रभुः।।'
अकुल की कुलप्रथनशालिनी शक्ति को ही कौलिकी शक्ति कहते हैं। ऐसी
अकुल की कुलप्रथनशालिनी शक्ति ही कुल-नायिका कहलाती है। वृत्तिकार ने
दो सहस्र दल कमलों को ही 'अकुल' कहा है। एक ऊर्ध्वमुख अकुल पद्म
मूलाधार के नीचे और अधोमुख एक अकुल सहस्रार पद्म भी है, जिसे सहस्रार
कहते हैं। यहाँ पर ब्रह्मरन्ध्रस्थ अकुल पद्म को अकुल कहा गया है। उसकी
नायिका सहस्राराधिष्ठात्री परमाम्बा ललिता त्रिपुरसुन्दरी मानी जाती है। वह
अखण्ड एकरस आनन्द प्रदान करने वाली परमाम्बा परात्मक ब्रह्मरन्ध्रस्थ सुधा
से समग्र विश्व को अभिषिक्त करती है। उपासक यह प्रार्थना करता है कि, मातः,
तुम अत्र अर्थात् यहाँ इस कर्म यज्ञ में स्वच्छन्द अर्थात् स्वातन्त्र्यमयी
चित्स्फुरणता को स्थापित करो।
हे क्लिन्न (आर्द्र) अर्थात् दया-द्रवित माँ, तुम वात्सल्यमयी हो, मुझ वत्स
पर कृपा करो। मुझ अबोध उपासक में देहाभिमान भरा हुआ है। तुम्हारी उपासना
का आनन्द निर्झर भी मेरे हृदय में फूटता है। हे परब्रह्मस्वरूपिणि, तुम
आनन्दरूपिणी भी हो। इसी आनन्दीभाव से भव्य माँ तुमसे मेरी यही प्रार्थना
है कि, मेरे चित्त का ऐकरस्यत्व तुमसे सम्पादित कर दिया जाय। अर्थात् हे
आनन्दमयी माँ, मेरे चित्त में चिरन्तनरूपा तुम्हारे आनन्द का उल्लास मङ्गलमयी