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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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८८ परशुरामकल्पसूत्रम्
लघु विप्रुट्बिन्दुओँ से अपना प्रोक्षण करे। साथ ही साथ पूजा के उपकरणों को
भी प्रोञ्छित करना चाहिये।।२२।।
एवं सामान्यार्घ्यैस्तृप्तिं विधाय विशेषार्घ्यतृप्तिमाह
तज्जलेन त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा मध्यं
विद्यया विद्याखण्डैस्त्रिकोणं बीजावृत्त्या षडस्रं सम्पूज्य वाचमुच्चार्य
अग्निमण्डलाय दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नम इति प्रतिष्ठाप्य
आधारं प्रपूज्य पावकीः कलाः ।।२३।।
तज्जलेन सामान्यार्घ्योदकेन। मध्यं त्रिकोणमध्यम्। विद्यया समष्टि-
विद्यया। सम्पूज्य इति सर्वत्रानुषज्यते। विद्याखण्डैः कूटत्रयेण त्रिकोणं त्रिकोणं
कोणत्रयम् बीजावृत्त्या कूटत्रयद्विरावृत्त्या। षडस्रं सम्पूज्य। वाचं 'ऐं' इति
(सबिन्दुः ऐकारो वाग्भव इति सिध्यति) रविश्वरो बिन्दुयुक्तो वाग्भवं बीज-
मीरितम् इति बीजकोशः। मन्त्रः 'ऐं अग्निमण्डलाय दशकलात्मने
अर्घ्यपात्राधाराय नमः।' इति नमोऽन्तो मन्त्रः। पावकीः वह्निसम्बन्धिनीः।
कलाः चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तैस्तत्तन्नामभिः प्रागादिवृत्तरूपं यजेत् ।।२३।।
सामान्य अर्घ्य के जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल
की विधि से मत्स्यमुद्रा द्वारा निर्गमन कर त्रिकोण मध्य को समष्टिविद्या से अर्चित
करना चाहिये। विद्याखण्ड अर्थात् कूटत्रय से त्रिकोणों की पूजा की जानी चाहिये।
बीजों की आवृत्तिपूर्वक कूटत्रय की दो आवृत्ति से षडस्र की अर्चना भी आवश्यक
मानी जाती है। पुनः वाग्भव बीज 'ऐं' का उच्चारण कर 'अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः' इस मन्त्र को बोलने से पूरा मन्त्र बनता है।
इस मन्त्र से प्रतिष्ठा कर आधार की पूजा करनी चाहिये। पावक की दश कलाओं
के चतुर्थ्यन्त नाम के साथ नमः लगाकर उनकी पृथक् पृथक् पूजा करनी
चाहिये।।२३।।
मदनादुपरि सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने अर्घ्यपात्राय नम इति
संविधाय पात्रं संस्पृश्य कलाः सौरीः, 'सोममण्डलाय
षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नमः' इति पूरयित्वा आदिमं
दत्वोपादिममध्यमौ पूजयित्वा विधोः कलाषोडशकम् ।।२४।।