परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीक्रमः ८९
मदनस्तु चतुरासनन्यासे (सूत्रे) प्रपञ्चितः। शेषं स्पष्टम्। पात्रं पात्रे सौरीः
कलास्तापिन्यादीः संस्पृश्य पूजयित्वा। आदिमं प्रथमं पूरयित्वा उपादिमं द्वितीयं
मध्यमं तृतीयं तत्रैव स्थापयित्वा विधोः कलाषोडशकम् अमृतादि-
पूर्णमृतान्तम् ।।२४।।
मदन कामवाचक शब्द है। आगमिक कोश की दृष्टि से यह मायाबीज
का वाचक कूट शब्द माना जाता है। मायाबीज के विषय में देवीभागवत की
उक्ति इस प्रकार है— ‘शिवमायाग्निबिन्दुमान्’। शिव हकार को कहते हैं। माया
ईकार है। अग्नि रेफ है और बिन्दु प्रसिद्ध अनुस्वार है। सबको मिलाकर ‘ह्रीं’
यह बीजमन्त्र बनता है। इसी को भुवना, भुवनेशी, लज्जा, हृल्लेखा और
कुलदेवता भी कहते हैं। वृत्तिकार ने कहा है कि, ‘प्रकृतेऽपि स एव मदनो
व्याख्यातः।’
किन्तु यह मान्यता प्रकृत सूत्र के अनुकूल नहीं है। मदन के पर्याय वर्ण
चार हैं—१. इ, २. क, ३. उ और ४. क्लीं। इस तरह मदन का प्रस्तुत प्रसङ्ग
में ‘क्लीं’ बीज में ही तात्पर्य है। यही बाला का मध्य बीज भी है। इसलिये
इस सूत्र में क्लीं के बाद ही अर्थात् इस बीज का ही पहले उच्चारण कर सूर्य
मन्त्र बनता है। इस मन्त्र से १२ सौरी कलाओं की पूजा होनी चाहिये। इसी
तरह चान्द्रकलाओं की पूजा ‘क्लीं सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय
नमः’ इस मन्त्र से करनी चाहिये। इसमें प्रथम आदिम द्वितीय उपादिम अर्थात्
दूसरी और मध्यम अर्थात् तीसरी कलाओं का क्रम अपनाना चाहिये ।।२४।।
तत्र विलिख्य त्र्यस्रमकथादिमयंरेखं हलक्षयुगान्त-स्थित-
हंसभास्वरं वाक्कामशक्तियुक्तकोणं कृत्वा षडस्रं षडङ्गेन
पुरोभागाद्यभ्यर्च्य मूलेन सप्तधा अभिमन्त्र्य दत्तगन्धाक्षतपुष्पधूपदीपः
तद्विप्रुड्भिः प्रोक्षितपूजाद्रव्यः सर्वं विद्यामयं कृत्वा तत्स्पृष्ट्वा
चतुर्नवतिमन्त्रान् जपेत् ।।२५।।
तत्र प्रथमद्रव्ये पूर्वोक्तक्रमेण पूजयित्वा अकारादिविसर्गान्तषोडशस्वरैः
पश्चिमादीशानान्ताम् एकां रेखां कुर्यात्। तत ईशानाद्याग्नेयान्तां कवर्गमारभ्य
तान्तैः षोडशवर्णैः अपरां रेखां सम्पादयेत्। तद् आग्नेयादिपश्चिमान्तं
यादिसान्तैः षोडशभिस्तृतीयारेखां सम्पादयेत्। एवं सति अश्च कश्च थश्च