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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 320 में से

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पृष्ठ 134

९२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मे। गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति गर्भं ते अश्विनौ
देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ। इत्येते पञ्चमन्त्राः। मूलविद्या चाहत्य
चतुर्नवति-मन्त्राः।।२६।।
त्रितारी पूर्वोक्ता। त्रितारी नम इत्यनयोर्मध्ये चतुर्नवतिमन्त्रान् पठेत्।
यथा च द्वाभ्यां सम्पुटितो भवति। तेजस्त्रितयं वह्निसूर्यसोमास्तेषां कलाः
(श्यामाक्रमे १८ सूत्रे) अष्टात्रिशंत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—'ऐं ह्रीं श्रीं धूम्रार्चिषे
नमः'। एवम् अग्रेऽपि ज्ञेयम्। वह्निकलाः १०। सूर्यकलाः १२। चन्द्रकलाः
१६। ब्रह्मकलाः १०। विष्णुकलाः १०। रुद्रकलाः १०। ईश्वरकलाः ४।
सदाशिवकलाः १६। इत्थं च कलाः सर्वाः ८८। यद्यपि हंसश्शुचिषद्
इत्यारभ्य पुष्करस्रजावित्यन्तं सप्त ऋचः सन्ति, तथापि 'इत्येते पञ्च मन्त्राः'
इत्युक्त्या चतुर्थपञ्चमौ मिलित्वा एको मन्त्रः। षष्ठसप्तमौ मिलित्वा एको मन्त्रः।
मूलविद्या पञ्चदशी। पूर्वकलाः ८८। उक्तमन्त्राः पञ्च। मूलविद्या चाहत्य सर्वं
मिलित्वा चतुर्नवति-मन्त्राः सम्पद्यन्ते। एतैरभिमन्त्रणेन द्रव्यं संस्कुर्याद् इति
फलितार्थः ।।२६।।
त्रितारी प्रसिद्ध प्रयोग है। यह 'ऐं ह्रीं श्रीं' तीन बीज मन्त्रों के और नमः
के बीच में क्रमशः ९४ मन्त्र सम्पुटित होकर बनते हैं। जैसे वह्नि की पहली
कला का नाम 'धूम्रार्चिः' है। इसके पहले त्रितारी का प्रयोग करें। धूम्रार्चिः में
चतुर्थी विभक्ति लगाकर धूम्रार्चिषे कहें। पुनः नमः जोड़ दें। मन्त्र बनेगा 'ऐं ह्रीं
श्रीं धूम्रार्चिषे नमः'। इसी तरह वह्नि १०, सूर्य १२, सोम १६, ब्रह्मा १०,
विष्णु १०, रुद्र १०, ईश्वर ४ और सदाशिव की १६ = ८८ कलायें होती
हैं। इन सभी कलाओं के पहले त्रितारी बोलकर प्रत्येक में नमः लगाकर ८८
मन्त्र बनते हैं।
इसी तरह 'हंसः शुचिषत्' से लेकर 'पुष्करस्रजौ' तक सात ऋचाओं में
चौथी (तद्विष्णोः परमं पदं.....चक्षुराततम्) और पाँचवीं (तद्विप्रासो.....परमं पदम्)
मिलाकर एक मन्त्र बनाते हैं। यह द्विनवतितम मन्त्र होगा। पुनः छठी और सातवीं
मिलाकर त्रितारी और नमः से संपुटित कर ९३ तम बनता है। पुनः
त्रितारी + मूलविद्या + नमः योग से ९४ मन्त्र बनते हैं। इनका जप करने का
निर्देश सूत्र २५ में ही है।।२६।।