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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 320 में से

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पृष्ठ 137

चारुता भर दे। ध्यान में तुम्हारी एकरूपता सिद्ध हो जाय। मेरी चिति शक्ति
में ऊर्जा भर दे। वह तुम्हारे अस्तित्व के परिवेश में मेरी संवित्ति की स्फुरत्ता
जागृत कर दे। यह अनुष्टुप् छन्दों में व्यक्त आनुष्टुभी विद्या है।।२८।।
चतर्थम् अमृतेशीमन्त्रमाह
अथो वाचो 'ब्लूं झौं'मिति 'जूं सः' इति चोक्त्वा अमृते
अमृतोद्भवे अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहेति
चतुर्थो मन्त्रः ।।२९।।
वाचम् ऐं, अतिद्वयं चोक्त्वेति च त्यक्त्वा शेषं मन्त्रस्वरूपम्। हे अमृते
अस्मिन् द्रव्ये अमृतं स्रावय इति। शेषाण्यमृते इत्यस्य विशेषणानि।।२९।।
आनुष्टुभी, तीन महाविद्याओं के बाद यहाँ अमृतेशी विद्या का कथन कर
रहे हैं। इस मन्त्र में अर्थात् ऐं बीज, पुनः 'ब्लूं' बीज पुनः 'झौं' बीज, का
प्रयोग करना चाहिये। तीनों बीज मन्त्रों के प्रयोग के बाद 'अमृते अमृतोद्भवे
अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहा' इस मन्त्रांश का प्रयोग
करते हैं। इस मन्त्र का आनन्दवादी रूप महत्त्वपूर्ण माना जाता है।।२९।।
पञ्चमं मन्त्रमुद्धरति
वाग्भवो वद वद ततो वाग्वादिनि वाङ्‌मदनक्लिन्ने क्लेदिनि
क्लेदय महाक्षोभं कुरुयुगलं मादनं शक्तिर्मोक्षं कुरु कुरु शब्दैः
सहचतुर्दशपञ्चदशपिण्डः सहचतुर्दशषोडशपिण्डश्चेति पञ्चमीयं
विद्यैताभिः अभिमन्त्र्य ज्योतिर्मयं तदर्घ्यं विधाय ।।३०।।
वाग्भवः ऐं। वाक् ऐं। मदनः क्लीं। कुरुयुगलं द्विवारं कुर्वित्युच्चार्य।
मादनं क्लीं। शक्तिः सौः। अचां चतुर्दशः औ। पञ्चदशः अनुस्वारः। पिण्डः
समुदायः। षोडशो विसर्गः। तथा च मन्त्रस्वरूपम् 'ऐं वद वद वाग्वादिनि
ऐं क्लीं क्लिन्ने क्लेदिनि क्लेदय महाक्षोभं कुरु कुरु क्लीं सौः मोक्षं कुरु
कुरु हसौँ स्हौः।' इतीयं पञ्चमी विद्या। एताभिः पञ्चभिः अभिमन्त्र्य ज्योतिर्मयं
निर्दोषं तदर्घ्यं विधाय।। ।।