सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

श्रीक्रमः ८७
देवीरूपत्वसिद्धये न्यासानुक्त्वा ततोऽर्चनाङ्गभूतपात्रस्थापनविधिमुपदिशति
शुद्धाम्भसा वामभागे त्रिकोणषट्कोणवृत्तचतुरस्रमण्डलं कृत्वा
पुष्पैैरभ्यर्च्य साधारं शङ्खं प्रतिष्ठाप्य शुद्धजलमापूर्य आदिम-बिन्दुं
दत्त्वा षडङ्गेनाभ्यर्च्य विद्यया अभिमन्त्र्य तज्जलविप्रुड्भिरात्मानं
पूजोपकरणानि च सम्प्रोक्ष्य ।।२२।।
शुद्धाम्भसा इत्यनेन गणपतिपद्धतौ कथितगन्धाक्षतकुसुमसमर्चितत्वं
ज्ञापितम्। शुद्धेन पटपूतेनाम्भसा स्ववामभागे त्रिकोणादिचतुरस्रान्तं
नियमविधिरूपत्वाद् आकाङ्क्षावत्वात् श्यामाक्रमोक्तमत्स्यमुद्रया निर्गमनरीत्या
कृत्वा पुष्पैैरभ्यर्च्य।
आधारशङ्खयोः प्रतिष्ठापने शुद्धजलपूरणे च सन्निहितत्वाविशेषाद्
गणपतिप्रकरणस्थं श्यामाप्रकरणस्थं वा स्वेच्छया कुर्यात्। आदिमबिन्दुसंयोगः
शङ्खजलसंस्कारः। षडङ्गेन षडङ्गमन्त्रैः अग्नीशासुर-वायुकोणेषु षडङ्गदेवता
अभ्यर्च्य। विद्यया पञ्चदश्या। अभिमन्त्र्य अभिमन्त्रणेन संस्कृत्य तज्जलं
संस्कृतजलं तस्य ये विप्रुषो बिन्दवस्तैरात्मानं स्वशरीरं पूजोपकरणानि
गन्धपुष्पप्रथमादीनि च सम्प्रोक्ष्य।।२२।।
शुद्धेन पटरूप शुद्ध जल से ही पूजा का विधान है। यहाँ स्पष्ट उल्लेख
करने का विशिष्ट तात्पर्य गन्धाक्षत-कुसुमांचित वस्त्र से छने हुए जल से है।
वामभाग में अर्थात् श्रीविद्योपासक के अपने ही वामभाग का अर्थ लेना चाहिये।
विधि के अनुसार त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुरस्र मण्डल का श्यामाक्रम
में कहे गये मत्स्यमुद्रा के प्रयोग द्वारा निर्गमन रीति के अनुसार करे और पुष्पों
से उनका पूजन करे।
शङ्ख की प्रतिष्ठा आधार पर करते हैं। ऐसे आधारसहित प्रतिष्ठा करने
के उपरान्त उसे शुद्ध जल से भर देना चाहिये। आदिम बिन्दु के संयोग से
जल का संस्कार हो जाता है। इसके बाद षडङ्गपूजन आवश्यक होता है। यह
पूजन क्रमशः अग्नि, कुबेर, वायु कोणों में षडङ्गमन्त्रों से सम्पन्न किया जाता
है। इन कार्यों के अनन्तर पञ्चदशी विद्या से अभिमन्त्रण कर उसी जल के लघु-