परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीक्रमः ८५
इति शिरसि न्यसेत्। कवर्गः सबिन्दुः 'कलहीं' इत्यत्र केवलं व्यञ्जनमात्र-
ग्रहणम्। तथा च 'कं खं गं घं ङं क्ल्हीं कामेश्वरी-वाग्देवतायै नमः' इति
ललाटे न्यसेत्। चुं चवर्गं नम इत्यन्तं मन्त्रं पठित्वा भ्रूमध्ये न्यसेत्। टुं टवर्गं
पूर्ववत्। हसलवर्णे तु व्यञ्जनमात्रग्रहणम्। शेषं स्पष्टम्॥२०॥
यहाँ वशिनी आदि योगिनियों के न्यास का वर्णन किया गया है। ये सभी
वाग्देवता मानी जाती हैं। इनकी संख्या और नाम इस प्रकार हैं—
१. वशिनी, २. कामेश्वरी, ३. मोदिनी, ४. विमला, ५. अरुणा,
६. जयिनी, ७. सर्वेश्वरी, ८. कौलिनी। इनके न्यास के समय सर्वप्रथम अकारादि
सबिन्दु आठों वर्ग, निर्धारित बीजमन्त्र, इनके नाम और नमः लगाकर आठ अङ्गों
का स्पर्श करते हैं। इसका क्रम इस प्रकार समझना चाहिये—
क्र. वर्ग निर्धारित विशेष विशेषण नमः स्थान
सं. बीज नाम
१. अवर्ग (सबिन्दु) ब्लूं वशिनी वाग्देवतायै नमः शिरसि
२. सबिन्दु कवर्ग क्ल्हीं कामेश्वरी वाग्देवतायै नमः ललाटे
३. सबिन्दु चवर्ग न्क्लीं मोदिनी वाग्देवतायै नमः भ्रूमध्ये
४. टुं टवर्ग य्लूं विमला वाग्देवतायै नमः कण्ठे
५. तुं तवर्ग ज्म्रीं अरुणा वाग्देवतायै नमः हृदि
६. पुं पवर्ग हस्ल्व्यूं जयिनी वाग्देवतायै नमः नाभौ
७. यादिचतुष्क झ्म्र्यूं सर्वेश्वरी वाग्देवतायै नमः लिङ्गे
(यं रं लं वं)
८. शादिशट्क क्ष्मीं कौलिनी वाग्देवतायै नमः मूलाधारे
(शं षं सं हं कं क्षं)
इस तरह ये आठ मन्त्र बनते हैं। इन मन्त्रों से योगिनी वाग्देवताओं का
शरीर के आठ मुख्य अङ्गों पर न्यास करना चाहिये। श्रीचक्र-साधना में इस
न्यास का बड़ा महत्त्व है। वाग्देवता ही विश्व-सृष्टि भी मूलाधार है। इसीलिये
इसमें १६ स्वरों २५ स्पर्शवर्णों ४ अन्तःस्थों और ४ ऊष्म वर्णों के साथ