परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ परशुरामकल्पसूत्रम्
वाग्भव और वाक् ये दोनों कूट शब्द हैं। इनसे ‘ऐं’ बीज का बोध होता
है। इसी तरह मदन और मादन इन दोनों शब्दों से ‘क्लीं’ बीज का बोध होता
है। शक्ति शब्द से यहाँ ‘सौः’ परा बीज का बोध होता है। स्वर सोलह होते
हैं। इनका चौदहवाँ अक्षर ‘औ’ चतुर्दश धाम माना जाता है। पन्द्रहवाँ अनुस्वार
और सोलहवाँ विसर्ग है। इन सबको मिलाकर जो मन्त्र बनता है, वह संस्कृत
व्याख्या में हैं। इसे ध्यान से स्पष्ट उच्चारणपूर्वक अर्घ्य जल का प्रोक्षण होता
है। इस मन्त्र को पञ्चमी ज्योतिर्मयी विद्या भी कहते हैं।।३०।।
तत्पात्रस्थबिन्दुभिः करणीयकृत्यमाह
तद्बिन्दुभिस्त्रिशः शिरसि गुरुपादुकामिष्ट्वा आर्द्रं ज्वलति
ज्योतिरहमस्मि ज्योतिर्ज्वलति ब्रह्माहमस्मि योऽहमस्मि ब्रह्माहमस्मि
अहमस्मि ब्रह्माहमस्मि अहमेवाहं मां जुहोमि स्वाहेति तद्बिन्दुमात्मनः
कुण्डलिन्यां जुहुयात् ।।३१।।
तद्बिन्दुभिर्विशेषार्घ्य बिन्दुभिस्त्रिशः त्रिवारं शिरसि द्वादशान्तस्थाने
गुरुपादुकामिष्ट्वा गुरुपादुकोद्देशेन द्रव्यदानं कृत्वा ‘आर्द्रं ज्वलति’ इति
स्वाहान्तमन्त्रेण तद्बिन्दुं गुरुपादुकायागशेषबिन्दुमित्यर्थः। आत्मनः स्वस्य
कुण्डलिन्यां चिद्वह्नौ, जुहुयाद् इत्यनेन अस्मिन् कर्मणि होमबुद्धिं दृढा
कार्या ।।३१।।
विशेष अर्घ्य जल के बिन्दुओं से तीन बार शिरोभाग के द्वादशान्त स्थान
में गुरुपादुका के उद्देश्य से अन्तर्याग कर ‘आर्द्रं ज्वलति’ से लेकर ‘स्वाहा’
पर्यन्त निर्दिष्ट मन्त्र से अर्घ्य के जल से ही अपनी कुण्डलिनी शक्ति की चिदग्नि
में हवन करें।
यह सूत्र श्रीविद्या-साधना की सर्वातिशायिनी दशा का शब्दचित्र
प्रस्तुत करता है। साधक की अहंता में इदन्ता का अवसान हो गया है। वह
ब्रह्ममयी मधुमती भूमिका में प्रवेश पा गया है। उसकी कुण्डलिनी की चिदग्नि
से उसका चिदाकाश प्रकाशमान हो रहा है। साधक की चेतना में ‘श्री’
का अवतरण अध्येता की अन्तर्दृष्टि में साक्षात् होता हुआ प्रतीत
हो रहा है।।३१।।