परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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अथ हैके पञ्चभिरखण्डाद्यैरभिमन्त्रणमामनन्ति ।।२७।।
अथेत्यनेन चतुर्नवतिमन्त्रोत्तरमेवेति क्रमः सूचितः। एके इत्यनेन
पाक्षिकत्वं सूचितम्। अखण्ड आद्यो येषामिति तद्गुणसंविज्ञान-
बहुव्रीहिः।।२७।।
सूत्र में सर्वप्रथम अथ शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह सूचना
हो रही है कि, पहले कहे गये ९४ मन्त्रों के बाद यह क्रम अपनाया जाना
चाहिये। 'ह' आवश्यक अर्थ में अव्यय प्रयुक्त है। एके शब्द यह सूचित करता
है कि, कुछ लोग ही यह नया क्रम अपनाने के पक्षधर हैं। उनके अनुसार
पाँच ऐसे मन्त्रों का उल्लेख किया गया है, जिनसे सुधा देवी का अभिमन्त्रण
करना चाहिये। अखण्डाद्य शब्द में तद्गुण-संविज्ञान बहुव्रीहि समास है।।२७।।
अखण्डाद्याः के ? इत्याकाङ्क्षायामाह
अखण्डैकरसानन्दकरे परसुधात्मनि ।
स्वच्छन्दस्फुरणामत्र निधेह्यकुलनायिके ।।१।।
अकुलस्थाऽमृताकारे शुद्धज्ञानकरे परे ।
अमृतत्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्नरूपिणि ।।२।।
तद्रूपिण्यैकरस्यत्वं कृत्वा ह्येतत्स्वरूपिणि ।
भूत्वा परामृताकारा मयि चित्स्फुरणं कुरु ।।३।।
इति तिस्रो अनुष्टुभो विद्याः ।।२८।।
सहस्रदलं कमलद्वयम्। सर्वकमलानामाधारभूतं ऊर्ध्वमुखमेकं पद्मं
मूलाधारस्याधस्तिष्ठति। तदेकमकुलपदवाच्यम्। एवं ब्रह्मरन्ध्रस्थिताधो
मुखसहस्रच्छदपद्ममपि अकुलम्। प्रकृते ब्रह्मरन्ध्रस्थितस्यैव ग्रहणम्। तस्यैव
अमृतस्रावित्वात्। अकुलस्य नायिका तदधिष्ठात्री तत्सम्बोधने हे
'अकुलनायिके! अखण्डो अविच्छिन्न एकरसो दुःखासम्भिन्नो य आनन्दस्तं
करोति व्यञ्जयति तादृशे। परा उत्कृष्टा या सुधा ब्रह्मरन्ध्रस्था अमरत्वकारिणी
तदात्मनि तत्स्वरूपे। अत्र स्वच्छन्दा स्वतन्त्रा या चित् तस्याः, स्फुरणां