पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७३
हाड़ चाम नहिं मास नहीं कछु रूप न रेखा ।
कैसे लागै हाथ नहीं कोउ मन को देखा ॥
छिन में कथै बैराग छिनै में होवै राजा ।
छिन में रोवै हँसे छिनै में आपु बिराजा ॥
पलटू पलकै भरे में लाख कोस पर जाय ।
मन मारे मरता नहीं कीन्हे कोटि उपाय ॥
॥ माया ॥
( १८३ )
माया ठगनी जग ठगा इकहै१ ठगा न कोय ॥
इकहै ठगा न कोय लिये है तिगुर्न गाँसी ।
सुर नर मुनि देय डिगाय करै यह सब की हाँसी ॥
इंद्रहु को यह ठगा ठगा दुर्बासै जाई ।
नारद मुनि को ठगा चली ना कछु चतुराई ॥
सिवसंकर को ठगा बड़े जो नेजाधारी ।
सिंगी ऋषी जवान२ बीछ कै बन में मारी ॥
पलटू इह को सो ठगा जो साचा भक्ता होय ।
माया ठगनी जग ठगा इकहै ठगा न कोय ॥
( १८४ )
माया बड़ी बहादुरी लूटि लिहा संसार ॥
लूटि लिहा संसार केहू को मानै नहीं ।
तनिक उजुर जो करै ताहि को कच्चा खाही ॥
कहूँ कनक कहूँ कामिनि सुन्दर भेष बनावै ।
ताकै जेकरी ओर नजर से मारि गिरावै ॥
जोगी जती औ तपी गुफा से पकरि मँगावै ।
बचै न कोऊ भागि दुपहरै लूटा जावै ॥
(१) इस को । (२) बहादुर ।
१०
७५ कुंडलिया
पलटू डरपै संत से वे मारैं पैजार ॥
माया बड़ी बहादुरी लूटि लिहा संसार ॥
( १८५ )
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
पीसि गया संसार बचै ना लाख बचावै ।
दोऊ पट के बीच कोऊ ना साबित जावै ॥
काम क्रोध मद लोभ चक्की के पीसनहारे ।
तिरगुन डारै झीक१ पकरि कै सबै निकारे ॥
दुरमति बड़ी सयानि सानि कै रोटी पोवै ।
करम तवा में धारि सेंकि कै साबित होवै ॥
तृस्ना बड़ी छिनारि जाइ उन सब घर घाला ।
काल बड़ा बरियार किया उन एक निवाला ॥
पलटू हरि के भजन बिनु कोऊ न उतरै पार ।
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
( १८६ )
नागिनि पैदा करत है आपुइ नागिनि खाय ॥
आपुइ नागिनि खाय नागिनि से कोय न बाचै ।
नेजाधारी सम्भु नागिनि के आगे नाचै ॥
सिंगी ऋषि को जाय नागिनि ने बन में खाई ।
नारद आगे पड़े लहर उन्हूँ को आई ॥
सुर नर मुनि गनदेव सभन को नागिनि लीलै ।
जोगी जती औ तपी नहीं काहू को ढीलै२ ।
सन्त बिबेकी गरुड़ हैं पलटू देखि डेराय ।
नागिनि पैदा करत है आपुइ नागिनि खाय ॥
( १८७ )
कुसल कहाँ से पाइये नागिनि के परसंग ॥
(१) मुट्ठी मुट्ठी अनाज जो चक्की में डालते हैं । (२) छोड़े ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ७५
नागिनि के परसंग जीव कै भच्छक सोई ।
पहरू कीजै चोर कुसल कहवाँ से होई ॥
रूई के घर बीच तहाँ पावक लै राखै ॥
बालक आगे जहर राखि करिके वा चाखै ॥
कनक धार जो होय ताहि ना अंग लगावै ।
खाया चाहै खीर गाँव में सेर बसावै ।
पलटू माया से डेरै करै भजन में भंग ।
कुसल कहाँ से पाइये नागिनि के परसंग ॥
( १८८ )
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
देखा चारिउ खूँट माया से बचै न कोई ।
राजा रंक फकीर माया के बसि में होई ॥
सब को बसि में करै जगत को माया जीती ।
आपु न बसि में होय रहै वह सब से रीती ॥
हरि को देइ भुलाय अमल वह अपना करती ।
ऐसी है वह नारि खसम को नाहीं डरती ॥
पलटू सब संसार को माया लीन्हो लूट ।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन देखा चारिउ खूँट ॥
( १८६ )
मन माया छोड़ै नहीं बधै आपु से जाय ।
बधै आपु से जाय गही ज्यों मरकट मूठी ।
ज्यों नलनी का सुआ बात सब ऐसी झूठी ॥
छोड़ै नहीं आपु भरम में पड़ा गँवारा ।
खैंचि लेय जो हाथ कोऊ ना पकड़नहारा ॥
जिव लै बचै तो भागु भूलि गइ सब चतुराई ।
रोवन लागे पूत काल ने पकरा आई ॥
पलटू आसा बधिक है लालच बुरी बलाय ।
मन माया छोड़ै नहीं भझै आपु से जाय ॥
॥ अज्ञानता ॥
( १६० )
घर में जिन्दा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
मुरदा पूजन जायँ भोति को सिरदा१ नावैं ।
पान फूल और खाँड़ जाइ कै तुरत चढ़ावैं ॥
ताल कि माटी आनि ऊँच कै बाँधिनि चौरी ।
लीपि पोति के धरिनि पूरी औ बरा कचौरी ॥
पीयर लूगा२ पहिरि जाइ कै बैठिनि बूढ़ा ।
भरमि भरमि अभुवाई माँगत हैं खसी३ कै मँड़ा ॥
पलटू सब घर बाँटि कै लै लै बैठे खायँ ।
घर में जिंदा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
( १६१ )
जियतै देइ गिरास ना मुए परावै पिंड ॥
मुए परावै पिंड कौन है खावनहारो ।
राँध परोसिनि नेवति खवावै ससुरा सारो ॥
पितरन के मुँह छार धोख दै लेइ बड़ाई ।
मुए बैल को घास देहु कहु कैसे खाई ॥
अपने परुसा४ लेइ पित्र को छोड़ै पानी ।
करै पित्र से भूत बड़ो मूरख अज्ञानी ॥
पलटू पुरषा मुक्ति में करत भंड औ भिंड ।
जियतै देइ गिरास ना मुए परावै पिंड ॥
( १६२ )
पानी का को देइ प्यास से मुवा मुसाफिर ॥
मुवा मुसाफिर प्यास डोर औ लुटिया पासै ।
बैठ कुवाँ की जगत जतन बिनु कौन निकालै ॥
(१) सिजदा = दंडवत । (२) कपड़ा । (३) बकरा । (४) परोसा, पत्तल ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ७७
आगे भोजन धरा थारि में खाता नाहीं।
भूख भूख करै सोर कौन डारै मुख माहीं ॥
दीया बाती तेल आगि है नाहिं जरावै।
खसम सोया है पास खसम को खोजन जावै ॥
पलटू डगरा१ सूध अटकि कै परता गिर गिर।
पानी का को देइ प्यास से मुवा मुसाफिर ॥
( १६३ )
लहँगा परिगा दाग फूहरि साबुन से धोवै ॥
फूहरि धोवै दाग छुटै ना और बढ़ावै।
ज्यों ज्यों मलै बनाय सारे लहँगा फैलावै ॥
गाफिल में गइ सोय खसम को दोष लगावै।
ऐसी फूहरि नारि आप को नाहिं बचावै ॥
धोबी को नहिं देइ घरहिं में आपु छुड़ावै।
इक बेर दिहिसि निखारि लाज से नाहिं दिखावै ॥
पलटू परदा खोलि आपनौ घर घर रोवै।
लहँगा परिगा दाग फूहरि साबुन से धोवै ॥
( १६४ )
अँधरन केरि बजार में गया एक डिठियार ॥
गया एक डिठियार सबै अंधा उठि धाये।
अहमक आये आजु सबै मिलि तारो लाये ॥
डारौ आँखि फोरि रहौ तुम हमरी नाईं ।
सब अँधरन मिलि अंध अंध वा को ठहराई ॥
जँहवाँ लाखन अंध एक क्या करै बिचारा।
सुनै न वा की कोऊ तहाँ डिठियारै हारा ॥
पलटुदास यहि बात को कोऊ न करै बिचार।
(१) रास्ता ।
७८ कुंडलिया
अँधरन केरि बजार में गया एक डिठियार ॥
( १६५ )
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
काना राजा रहै ताहि कै रैयत आँधा ।
काना को अगुवाइ एक इक पकरिनि काँधा ॥
बीच मिला दरियाव अंध को ठाढ़ कराई ।
लेन गया वह थाह सूँसि¹ लैगा घिसियाई ॥
साँझ आइ नियरानि अंध सब करें बिचारा ।
लाग खान को करन बड़ा सरदार हमारा ॥
आधी रात के बीच सबै मिलि गौगा² लाई ।
भेड़हा³ बोला आय चलो इक एक बुलाई ॥
एक एक तुम चलो नाहिं है बासन⁴ दूजा ।
गरदन धै लैजाय करै ताही की पूजा ॥
पलटू सब को खाय मगन ह्वै भेड़हा गाजा ।
सब अँधरन के बीच एक है काना राजा ॥
॥ दुष्ट ॥
( १६६ )
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
पलटू अपने आप संत का सरल सुभाऊ ।
सब को मानहिं भला नाहिं कछु करहिं दुराऊ ॥
लाख दुष्ट जो होइ भला तेहू का मानैं ।
आपन ऐसा जीव संत जन सब का जानैं ॥
अपनी करनी जाय होय जो निंदक कोई ।
आन को गड़हा खनै परैगा आपुहि सोई ॥
जब देखै वह संत को तब चढ़ि आवै ताप⁵ ।
(१) कर्म से भाव हैं। (२) शोर। (३) काल से भाव हैं। (४) बरतन।
(५) बुखार।
पलटू साहिब को बानी भाग—१ ७६
अपकारी जिव जाहिंगे पलटू अपने आप ॥
( १६७ )
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
पसँघा मारे जाय पूर को मरम न जानी ।
निसु दिन तौलै घाटि खोय१ यह परी पुशनी ॥
केतिक कहा पुकारि कहा नहिं करै अनारी ।
लालच से भा पतित सहै नाना दुख भारी ॥
यह मन भा निरलज्ज लाज नहिं करै अपानी ।
जिन हरि पैदा किया ताहि का मरम न जानी ॥
चौरासी फिरि आइ कै पलटू जूती खाय ।
बनियाँ बानि न छोड़ै पसँघा मारे जाय ॥
( १६८ )
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
कुंजी दुष्टन हाथ अटकि के खोलहिं जाई ।
संत भये परसिद्ध परभुता नाम दिखाई ॥
चकमक भये हैं दुष्ट संत जन जैसे पथरी ।
हरि की प्रभुता आगि प्रगट है वा से निकरी ॥
आगि देखि सब डेरे जगत में भय तब ब्यापी ।
दुष्टन के परताप बस्तु परगट भई ढाँपी ॥
पलटू परदा खुलि गया सबै नवावै माथ ।
संत रतन की कोठरी कुंजी दुष्टन हाथ ॥
॥ कर्म्म भर्म्म—देई देवा ॥
( १६६ )
अंजन देय न ज्ञान का अंधा भया बनाय२ ॥
अंधा भया बनाय बैद की बात न मानै ।
बिषय बयाला३ खाय, करे संजम ना जानै ॥
( १ ) आदत । ( २ ) पूरा । ( ३ ) हवा ।
तृतीय भाग: अरिल्ल, साखी एवं पद संग्रह उपसंहार
५० कुंडलिया
लालच रोगिया करै बैद को दोस लगावै ।
तनिक नहीं बिस्वास आँख कहवाँ से पावै ॥
एक होय तो कहौं गाँव का गाँव बिगरा ।
दिवसै दीपक बारि पाप का सेते डगरा १॥
पलटू सब संसार के माड़ा गया है छाय ।
अंजन देय न ज्ञान का अन्धा भया बनाय ॥
( २०० )
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
धोखा रहा समाय जानै दूजा है कोई ।
भीतर बाहर एक तसल्लो २ देखे होई ॥
जो देखा सो गया रहा जो देखा नाहीं ।
चोकर लड्डू खाँड़ खाय दोऊ पछिताहीं ॥
जोई पहुँचा जाय सोई उस घर का मालिक ।
रहे नाम में डूबि ठिकाने पहुँचे सालिक ३॥
पलटू परदा टारि दे दिल का धोखा जाय ।
जौं लगि परदा पड़ा है धोखा रहा समाय ॥
( २०१ )
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ४॥
आगे लिहिनि तकाय पाछे की मरम न जानी ।
ज्यों ज्यों आगे जाय दिनों दिन अधिक दुरानी ॥
फिरि के ताकै नाहिं बस्तु कहवाँ से पावै ।
ज्यों मिरगा कै बास भरम कै जन्म गवावै ॥
अरुझा बेद पुरान ज्ञान बिनु को सुरझावै ।
सतसंगत से बिमुख बस्तु कहवाँ से पावै ॥
पलटू छूटै कर्म ना कैसे सकै उठाय ।
(१) पाप के मारग या भाँडे को रखवाली करते हैं। (२) शांति । (३) अभ्यासी ।
(४) चल दिये ।
पलटू साहिब की बानी भाग १ 59
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ॥
( २०२ )
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
छिल छिल जाता अंग धसन भेड़ी की देखा ।
करम बड़ा परधान गड़ी पत्थर पर मेखा ॥
साच बात को मेटि झूठ कौ जाल पसारा ।
जल पषान के बीच बहै सब सुधी धारा ॥
परघट है भगवान सकल घट सूझत नाहीं ।
जीव से करते द्रोह भरमना पूजन जाहीं ॥
पलटू मैं का से कहौं कुवाँ पड़ी है भंग ।
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
( २०३ )
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
ढूँढ़त फिरै पहार नहीं घट की सुधि जानै ।
जप तप तीरथ बरत जाय के तिल तिल छानै ॥
गई आप को भूलि और की बात न मानै ।
चूल्है लड़िका रहै चतुरई अपनी ठानै ॥
भरमी फिरै भुलान जाइ कै देस देसान्तर ।
लड़िका से नहिं भेट मिलत है पानी पाथर ॥
पलटू सतसंगति करै भूल में वाही सार१ ।
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
( २०४ )
सूधी मारग में चलौं हँसै सकल संसार ॥
हँसै सकल ससार करम की राह बताई ।
लोक बेद की राह चला हम से नहिं जाई ॥
सूधी लिह्ना तकाय राह संतन की पाई ।
(१) भूल मिटाने को सतसंग ही सार जतन है।
११
८२ कुंडलिया
मन में भया अनन्द छूटि गइ सब दुचिताई ॥
उन कै इहवै हेतु¹ रह यह हमरी आवै ।
इहै बूझि कै हँसै हाथ से निबुका² जावै ॥
पलटू सब का एक मत को अब करै बिचार ।
सुधी मारग मैं चलौं हँसै सकल संसार ॥
(२०५)
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
झूठा देवा सेव नाम को दिया भुलाई ।
बाँधे जमपुर जाहिं काल चोटी घिसियाई ॥
पानी से जिन पिंड गरभ के बीच सँवारा ।
ऐसा साहिब छोड़ि जन्म औरै से हारा ।
ऐसे मूरख लोग खबर ना करैं अपानी ।
सिरजनहारा छोड़ि पूजते भूत भवानी ॥
पलटू इक गुरुदेव बिनु दूजा कोय न देव ।
भरमि भरमि सब जग मुवा झूठा देवा सेव ॥
(२०६)
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भूत बैताल ॥
पूजत भूत बैताल मुए पर भूतै होई ।
जेकर जहवाँ जीव अन्त को होवै सोई ॥
देव पितर सब झूठ सकल यह मन की भ्रमना ।
यही भरम में पड़ा लगा है जीवन मरना ॥
देई देवा सेइ परम पद केहि ने पावा ।
भैरौ दुर्गा सीव बाँधि कै नरक पठावा ॥
पलट अंत घसीटिहै चोटी धरि धरि काल ।
संत चरन को छोड़ि कै पूजत भत बैताल ॥
(१) संसार का यही अभिप्राय है । (२) निकला ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८३
( २०७ )
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
मारत अपने पाँय पूजत है देई देवा ।
सतगुरु संत बिसारि करै भूतन की सेवा ॥
चाहै कुसल गँवार अमी दै माहुर खावै ।
मने किये से लड़ै नरक में दौड़ा जावै ॥
पौंडै१ जल के बीच हाथ में बाँधे रसरी ।
परै भरम में जाइ ताहि को कैसे पकरी ॥
पलटू नर तन पाइ कै भजन मँहै अलसाय ।
लिये कुल्हाड़ी हाथ में मारत अपने पाँय ॥
( २०८ )
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
देखे चारो धाम सबन माँ पाथर पानी ।
करमन के बसि पड़े मुक्ति की राह भुलानी ॥
चलत चलत पग थके छीन भइ अपनी काया ।
काम क्रोध नहिं मिटे बैठ कर बहुत नहाया ॥
ऊपर डाला धोय मैल दिल बीच समाना ।
पाथर में गयो भूल संत का मरम न जाना ॥
पलटू नाहक पचि मुए सन्तन में है नाम ।
सात पुरी हम देखिया देखे चारो धाम ॥
( २०६ )
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटी बीनन जाय ॥
टेंटी बीनन जाय जानै येही है मेवा ।
तीरथ मँहै नहाय करै मूरति की सेवा ॥
छोड़ि बोलता ब्रह्म करै पथरे की पूजा ।
खसम न आवै पास नारि जब खोजै दूजा ॥
(१) तैरै।
८४ कुंडलिया
सूखा हाड़ चबाय स्वान मुख आवै लोहू ।
है हाड़ के भोर१ भेद ना जानै वोहू ॥
पलटू आगे धरा है आप से नाहीं खाय ।
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटो बीनन जाय ॥
( २१० )
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
लगवारन से प्रीति जीव से द्रोह बढ़ावै ।
पूजत फिरै पषान नहीं जो बोलै खावै ॥
सम्मै पूरन ब्रह्म ताहि को तनिक न मानै ।
करै नटी२ को काम लोक पतिबरता जानै ॥
उदर पालना करै नाम ठाकुर को लेई ।
सर्ब जीव भगवान ताहि को तनिक न सेई ॥
पलटू सबै सराहिये जरै जगत की रीति ।
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
( २११ )
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
बिस्वा होइ गइ बाँझ जाहि के पुरुष घनेरे ।
नाहिं एक की आस फिरै घर घर बहुतेरे ॥
एक केरि होइ रहै दुसर से होइ गलानी३ ।
तुरत गरभ रहि जाइ सिवाती४ चात्रिक पानी ॥
राम पुरुष को छोड़ि करै देवतन की पूजा ।
बिस्या की यह रीति खसम तजि खोजै दूजा ॥
पलटू बिना बिचार से मूरख डूबै माँझ५ ।
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
( २१२ )
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिगराम ॥
(१) भूल । (२) हरजाई । (३) घिन । (४) स्वांति । (५) मंझधार में ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ८५
मन करु सालिग्राम पूजते हाथ पिराने ।
धावत तीरथ बरत रैनि दिन गोड़ खियाने ॥
माला फेरि न जाय परे अँगुरिन में घट्टा ।
राम बोलि न जाय जीभ में लागै लट्ठा१॥
निति उठि चन्दन देत माथ कै लोहू सोखा ।
बालभोग के खात मिट्यो ना मन का धोखा ॥
जल पषान के पूजते सरा न एकौ काम ।
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिग्राम ॥
( २१३ )
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
सब को लागै टेढ़ बूझ बिनु कौन बतावै ।
आपु चलै सब टेढ़ टेढ़ हम को गोहरावै ॥
हम रहते निहकरम नाहिं करमन की आसा ।
तुम्हरे तीरथ बरत बहुरि मूरति बिस्वासा ॥
हमरे केवल राम आन को नाहीं जानों ।
तुम्हरे देवता पित्र भूत की पूजा मानो ॥
पलटू उलटा लोग सब नाहक करते खेढ़२ ।
सूधी मेरी चाल है सब को लागै टेढ़ ॥
( २१४ )
मैं अपने रँग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
जरि जरि मरते लोग सोच नाहक को करते ।
पर संपति को देखि मूढ़ बिनु मारे मरते ॥
ना काहू की जाति पाँति हम बैठन जाई ।
लोग करै चौवाव३ एक को एक बुलाई ॥
चलिहौं सूधी चाल राम के मारग माहीं ।
देव पितर तजि करम मानों काहू को नाहीं ॥
(१) लासा बंध जाना । (२) रार, झगड़ा । (३) निन्दा ।
८६ कुंडलिया
पलटू हम को देखि कै लोगन के भा रोग ।
मैं अपने रंग बावरी जरि जरि मरते लोग ॥
॥ जीव-हिंसा ॥
( २१५ )
लहम कुल्लहुम जिसिम का नबी किया फर्मूद१ ॥
नबी किया फर्मूद हदीस की आयत माहीं ।
सब में एकै जान और कोउ दूजा नाहीं ॥
खून गोस्त है एक मौलवी जिबह न छाजै२ ।
सब में रोसन हुआ नबी का नूर बिराजै ॥
क्यों खैंचै तू रूह३ गुनहगारी में पड़ता ।
बुजरुग के फर्मूद बमोजिब नहीं डेरता ॥
पलटू जो बेदरदी सो काफिर मरदूद ।
लहम कुल्लहुम जिसिम का नबी किया फर्मूद ॥
( २१६ )
गरदन मारै खसम की लगवारन के हेत ॥
लगवारन के हेत पसू औ मेंढ़ा मारै ।
पूजै दुरगा देव देवखरी सिर दै मारै ॥
माटी देवखरि बाँधि मुए की पूजा लावै ।
जीवत जिउ को मारि आनि कै ताहि चढ़ावै ॥
सब में है भगवान और ना दूजा कोई ।
तेकर यह गति करै भला कहवाँ से होई ॥
पलट जिउ को मारि कै बल देवतन को देत ।
गरदन मारै खसम की लगवारन के हेत ॥
॥ जाति भेद ॥
( २१७ )
हरि को भजै सो बड़ा है जाति न पूछै कोय ॥
(१) नबी ने फर्माया है कि कुल माँस जानदार की देह से आता है। (२) शोभा
नहीं देता । (३) जान ।
पलटू साहिब की बानी भाग १ ८७
जाति न पूछै कोय हरी को भक्ति पियारी ।
जो कोई करै सो बड़ा जाति हरि नाहिं निहारी ॥
बधिक अजामिल रहे रहे फिर सदन कसाई ।
गनिका बिस्वा रही बिमान पै तुरत चढ़ाई ॥
नीच जाति रैदास आपु में लिया मिलाई ।
लिया गिद्ध को गोदि दिया बैकुंठ पठाई ॥
पलटू पारस के छुए लोहा कंचन होय ।
हरि को भजै सो बड़ा है जाति न पूछै कोय ॥
( २१५ )
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥
केवल भक्ति पियार साहिब भक्ती में राजी ।
तजा सकल पकवान लिया दासीसुत भाजी¹ ॥
जप तप नेम अचार करै बहुतेरा कोई ।
खाये सेवरी के बेर¹ मुए सब ऋषि मुनि रोई ॥
किया युधिष्ठिर यज्ञ बटोरा सकल समाजा ।
मरदा सब का मान सुपच बिनु घंट न बाजा ॥
पलटू ऊँची जाति कौ जनि कोउ करें हंकार ।
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार ॥
( २१६ )
गनिका गिद्ध अजामिल सदना औ रैदास ॥
सदना औ रैदास भली इनकी बनि आई ।
निसु दिन रहें हजूर भक्ति कीन्ही अधेकाई ॥
जाति न उत्तम येह इन्हैं सम और न कोई ।
(१) श्रीकृष्ण ने राजा दुर्योधन का छप्पन प्रकार का भोजन त्याग कर बिदुर
भक्त का अलोना साग बड़ी रुचि से खाया था और सेवरी के कुतरे हुए बेर बड़े चाव
से चख कर अहंकारी ऋषियों और मुनियों के दाँत खट्टे किये ।
८८ कुंडलिया
ब्रह्म कोटि कुलीन नीच अब कहिये सोई ॥
उनसे बड़ा न कोय और सब उन के नीचे ।
उन्हें बराबर नहीं कोऊ तिलोकी के बीचे ॥
अबिनासी की गोद में पलटू करै बिलास ।
गनिका गिद्ध अजामिल सदना औ रैदास ॥
॥ निन्दक ॥
( २२० )
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी को चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगी रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
संत कँहै दृढ़ करै जगत का भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै !
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
( २२१ )
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥
हम को जोखों नाहिं गाँठि कौ साबुन लावै ।
खरचै अपनो दाम हमारी मैल छुड़ावै ॥
तन मन धन सब देहि संत की निन्दा कारन ।
लेहिं संत तेहि तार बड़े वे अधम-उधारन ॥
संत भरोसा बड़ा सदा निन्दक का करते ।
निन्दक की अति प्रीति भाव दूसर नहिं धरते ॥
पलटू वे परसवारथी निन्दक नर्क न जाहिं ।
निन्दक रहै जो कुसल से हम को जोखों नाहिं ॥
पलटू साहिब की बानी भाग - १ ८६
( २२२ )
निन्दक है परसवारथी करै भक्त का काम ॥
करै भक्त का काम जगत में निन्दा करते ।
जो वे होते नाहिं भक्त कहवाँ से तरते ॥
आप नरक में जाहिं भक्त का करें निबेरा ।
फिर भक्तन के हेतु करें चौरासी फेरा ॥
करें भक्त की सोच उन्हें कुछ और न भावै ।
देखो उनकी प्रीति लगन जब ऐसी लावै ॥
पलटू धोबी अस मिल्यौ धोवत है बिनु दाम ।
निन्दक है परसवारथी करै भक्त का काम ॥
॥ मिश्रित ॥
( २२३ )
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सत नाम ॥
जो तौलै सत नाम छिमा का टाट बिछावै ।
प्रेम तराजू करै बाट बिस्वास बनावै ॥
बिबेक की करै दुकान ज्ञान का लेना देना ।
गादी है संतोष नाम का मारै टेना ॥
लादै उलटै भजन बचन फिर मीठे बोलै ।
कुंजी लावै सुरत सबद का ताला खोलै ॥
पलटू जिसकी बन परी उसी से मेरा काम ।
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सत नाम ॥
( २२४ )
भीतर औटै तत्व को उठै सबद की खानि ॥
उठै सबद की खानि रहै अंतर लौ लागी ।
सुरति देइ उदगारि१ जोगिनी आपुइ जागी ॥
(१) जगाय ।
१२
सहज घाट हरि ध्यान ज्ञान से मन परमोथै ।
नहिं संग्रह नहिं त्याग आपनी काया सोधै ॥
० प्रेम भभूत लगाइ धरै धीरज मृगछाला ।
० तिलक उनमुनी भाल जपत है अजपा माला ॥
पलटू ऐसा होय जो सो जोगी परमान ।
भीतर औंटै तत्व को उठै सबद की खानि ॥
(२२५)
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
पलटूदास न लेइ रहै कर जोरे ठाढ़ी ।
सरनागति मैं रहौं सरन बिनु लागै गाढ़ी१ ।
गोड़ दाबि मैं देउँ चरन धै सेवा करिहौं ।
चौका देइहौं लीपि बहुरि मैं पानी भरिहौं ॥
पैंडा देउँ बुहारि सबन कै जूठ उठावौं ।
जनि दुरियावहु मोहिं रहै मैं इहवाँ पावौं ॥
मुक्ति रहै द्वारे खड़ी लट से झाड़ू देइ ।
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
(२२६)
सुरति सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
मिली सबद में जाय कन्त को बसि में कीन्हा ।
चलै न सिव कै जोर जाय जब सक्ती लीन्हा ॥
फिर सक्ती ना रही मिली जब सिव में जाई ।
सिव भी फिर ना रहे सक्ति से सीव कहाई ॥
अपने मन कै फेर और ना दूजा कोई ।
० सक्ती सिव है एक नाम कहने को दोई ॥
पलटू सक्ती सीव का भेद गया अलग़ाय ।
सुरत सुहागिनि उलटि कै मिली सबद में जाय ॥
(१) गाढ़ = दुख ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ६१
( २२७ )
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
घरहीं लागा रंग छुटे तीरथ ब्रत दाना ।
जल पषान सब छुटे आपु में उठि समाना ॥
काम क्रोध को छोड़ि परम सुख मिला अनन्दा ।
लोभ मोह को जारि करम का काटा फंदा ॥
लगै न भूख पियास जगत की आसा त्यागा ।
सबद मँहैं गलतान सुरति का पोहै धागा ॥
पलटू दिढ़ है लागि रहै छुटै नहीं सतसंग ।
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
( २२८ )
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
मारा गया बिबेक चोर का पहरू भेदी ।
दोऊ की मति एक सहर में करें अहेदी१ ॥
आँधर नगर के बीच भया धमधूसर२ राजा ।
करै नीच सब काम चलै दस दिसि दरवाजा ॥
अधरम आठो गाँठि न्याव बिनु धीगम सूदा३ ।
टकमि दमारि४ गुलाम आप को भयो असूदा५ ॥
जानि बूझि कूँआँ परै पलटू चलै न देख ।
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
( २२६ )
देखो जिउ की खोय को फिर फिर गोता खाय ॥
फिर फिर गोता खाय तनिक ना लज्जा आवै ।
पड़िगा वही सुभाव छुटै ना लाख छुटावै ॥
(१) एक लिपि में "अलेदी' है । "अहदी" बादशाही वक्त में बहादुर सिपाही
होते थे जो घर बैठे तनखाह पाते थे और सिर्फ भारी मुहिम पर भेजे जाते थे । इन
की जबरदस्ती और जुल्म प्रसिद्ध है । (२) मोटे । (३) धींगम धींगा, मनमाना । (४) टका
दमड़ी के लिये । (५) संतुष्ट ।
६२ कुंडलीया
निमिख भरे१ को खुसी जन्म कोटिन दुख पावै ।
चौरासी घर जाय आपु में आपु बंधावै ॥
स्वान लाख जो खाय दिया चाटै पै चाटै ।
छुटै न जिउ की खोय पकरि के पुरजे काटै ॥
पलटू भजै न नाम को मूरख नर तन पाय ।
देखो जिउ की खोय को फिर फिर गोता खाय ॥
( २३० )
मुए पार की बात है फिरै न कोऊ एक ।
फिरै न कोऊ एक मुक्ति धौं कैसी होती ।
स्याह जरद या सुरख रंग, हीरा या मोती ॥
मुक्ति के हाथ न पाँव मुक्ति को सब कोउ मानै ।
है पर्दे की बात ताहि से सब कोउ जानै ॥
सब कोउ होय खराब मुक्ति के पाछे जाई ।
जानी केहि बिधि जाय मुक्ति कहु किन ने पाई ॥
पलटू बातैं मुक्ति की खसर-फसर२ करि देख ।
मुए पार की बात है फिरै न कोऊ एक ॥
( २३१ )
चिन्ता रूपी अगिन में जरै सकल संसार ॥
जरै सकल संसार जरत निरपति को देखा ।
बादसाह उमराव जरत हैं सैयद सेखा ॥
सुर नर मुनि सब जरैं जोगी और जती सन्यासी ।
पंडित ज्ञानी चतुर जरैं कनफटा उदासी ॥
जंगम सिवरा जरैं जरैं नागा बैरागी ।
तपसी दूना जरै बचै नहिं कोऊ भागी ॥
पलटू बचते संत जन जेकरे नाम अधार ।
(१) छिन भर । (२) सरपट ।