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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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८४ कुंडलिया
सूखा हाड़ चबाय स्वान मुख आवै लोहू ।
है हाड़ के भोर१ भेद ना जानै वोहू ॥
पलटू आगे धरा है आप से नाहीं खाय ।
घर में मेवा छोड़ि कै टेंटो बीनन जाय ॥
( २१० )
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
लगवारन से प्रीति जीव से द्रोह बढ़ावै ।
पूजत फिरै पषान नहीं जो बोलै खावै ॥
सम्मै पूरन ब्रह्म ताहि को तनिक न मानै ।
करै नटी२ को काम लोक पतिबरता जानै ॥
उदर पालना करै नाम ठाकुर को लेई ।
सर्ब जीव भगवान ताहि को तनिक न सेई ॥
पलटू सबै सराहिये जरै जगत की रीति ।
लम्बा घूँघट काढ़ि कै लगवारन से प्रीति ॥
( २११ )
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
बिस्वा होइ गइ बाँझ जाहि के पुरुष घनेरे ।
नाहिं एक की आस फिरै घर घर बहुतेरे ॥
एक केरि होइ रहै दुसर से होइ गलानी३ ।
तुरत गरभ रहि जाइ सिवाती४ चात्रिक पानी ॥
राम पुरुष को छोड़ि करै देवतन की पूजा ।
बिस्या की यह रीति खसम तजि खोजै दूजा ॥
पलटू बिना बिचार से मूरख डूबै माँझ५ ।
बहुत पुरुष के भोग से बिस्वा होइ गइ बाँझ ॥
( २१२ )
पलटू तन करु देवहरा मन करु सालिगराम ॥
(१) भूल । (२) हरजाई । (३) घिन । (४) स्वांति । (५) मंझधार में ।