पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग १ 59
बस्तु धरी है पाछे आगे लिहिनि तकाय ॥
( २०२ )
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
छिल छिल जाता अंग धसन भेड़ी की देखा ।
करम बड़ा परधान गड़ी पत्थर पर मेखा ॥
साच बात को मेटि झूठ कौ जाल पसारा ।
जल पषान के बीच बहै सब सुधी धारा ॥
परघट है भगवान सकल घट सूझत नाहीं ।
जीव से करते द्रोह भरमना पूजन जाहीं ॥
पलटू मैं का से कहौं कुवाँ पड़ी है भंग ।
झूठे में सब जग चला छिल छिल जाता अंग ॥
( २०३ )
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
ढूँढ़त फिरै पहार नहीं घट की सुधि जानै ।
जप तप तीरथ बरत जाय के तिल तिल छानै ॥
गई आप को भूलि और की बात न मानै ।
चूल्है लड़िका रहै चतुरई अपनी ठानै ॥
भरमी फिरै भुलान जाइ कै देस देसान्तर ।
लड़िका से नहिं भेट मिलत है पानी पाथर ॥
पलटू सतसंगति करै भूल में वाही सार१ ।
लड़िका चूल्हे में लुका ढूँढ़त फिरै पहार ॥
( २०४ )
सूधी मारग में चलौं हँसै सकल संसार ॥
हँसै सकल ससार करम की राह बताई ।
लोक बेद की राह चला हम से नहिं जाई ॥
सूधी लिह्ना तकाय राह संतन की पाई ।
(१) भूल मिटाने को सतसंग ही सार जतन है।
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