पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग—१ ६१
( २२७ )
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
घरहीं लागा रंग छुटे तीरथ ब्रत दाना ।
जल पषान सब छुटे आपु में उठि समाना ॥
काम क्रोध को छोड़ि परम सुख मिला अनन्दा ।
लोभ मोह को जारि करम का काटा फंदा ॥
लगै न भूख पियास जगत की आसा त्यागा ।
सबद मँहैं गलतान सुरति का पोहै धागा ॥
पलटू दिढ़ है लागि रहै छुटै नहीं सतसंग ।
कहँ खोजन को जाइये घरहीं लागा रंग ॥
( २२८ )
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
मारा गया बिबेक चोर का पहरू भेदी ।
दोऊ की मति एक सहर में करें अहेदी१ ॥
आँधर नगर के बीच भया धमधूसर२ राजा ।
करै नीच सब काम चलै दस दिसि दरवाजा ॥
अधरम आठो गाँठि न्याव बिनु धीगम सूदा३ ।
टकमि दमारि४ गुलाम आप को भयो असूदा५ ॥
जानि बूझि कूँआँ परै पलटू चलै न देख ।
मन माया में मिलि गया मारा गया बिबेक ॥
( २२६ )
देखो जिउ की खोय को फिर फिर गोता खाय ॥
फिर फिर गोता खाय तनिक ना लज्जा आवै ।
पड़िगा वही सुभाव छुटै ना लाख छुटावै ॥
(१) एक लिपि में "अलेदी' है । "अहदी" बादशाही वक्त में बहादुर सिपाही
होते थे जो घर बैठे तनखाह पाते थे और सिर्फ भारी मुहिम पर भेजे जाते थे । इन
की जबरदस्ती और जुल्म प्रसिद्ध है । (२) मोटे । (३) धींगम धींगा, मनमाना । (४) टका
दमड़ी के लिये । (५) संतुष्ट ।